सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर लगाई रोक: कम अटेंडेंस वाले छात्र नहीं दे सकेंगे एग्जाम, “क्लास छोड़कर कैंपस में घूमना गंभीर चुनौती”

देशभर के लॉ कॉलेजों और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज में न्यूनतम उपस्थिति को लेकर बहस चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है। जिसमें कहा गया था कि कम अटेंडेंस के आधार पर किसी भी छात्र को परीक्षा देने से नहीं रोका जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए साफ संकेत दिया कि शिक्षा संस्थानों में अनुशासन और नियमित उपस्थिति से किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने लॉ कॉलेजों और बार काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि हाई कोर्ट के आदेश का असर देशभर की नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज और अन्य विधि संस्थानों पर पड़ रहा है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि छात्र इस फैसले को “फ्री पास” की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं और क्लास में उपस्थित हुए बिना परीक्षा में शामिल होने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
“अनुशासनहीनता को बढ़ावा दे सकता है आदेश”
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने अदालत को बताया कि दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश शिक्षा व्यवस्था के मूल ढांचे को कमजोर करता है। उन्होंने कहा कि नियमित कक्षाओं में भागीदारी विधि शिक्षा का अहम हिस्सा है। यदि न्यूनतम उपस्थिति की अनिवार्यता खत्म कर दी जाती है तो इससे शैक्षणिक अनुशासन प्रभावित होगा। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि कई छात्र क्लास बंक कर कैंपस में घूमते रहते हैं और ऐसे में यह आदेश गैर-जिम्मेदार रवैये को बढ़ावा देगा। सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए हाई कोर्ट के आदेश के पैराग्राफ 249 के अमल पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह रोक भविष्य के लिए प्रभावी होगी। मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को निर्धारित की गई है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया था बड़ा निर्देश
दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि किसी भी मान्यता प्राप्त लॉ कॉलेज, यूनिवर्सिटी या संस्थान में अध्ययनरत छात्र को केवल न्यूनतम उपस्थिति की कमी के आधार पर परीक्षा में बैठने से नहीं रोका जा सकता। अदालत ने यह भी कहा था कि किसी छात्र की कम हाजिरी उसके करियर और शैक्षणिक प्रगति में बाधा नहीं बननी चाहिए। हाई कोर्ट के इसी आदेश को चुनौती देते हुए कई लॉ संस्थानों और बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनका कहना था कि यदि न्यूनतम उपस्थिति की अनिवार्यता समाप्त हो गई तो इससे विधि शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
शिक्षा जगत में फैसले की व्यापक चर्चा
सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश के बाद शिक्षा जगत और विधि संस्थानों में व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि कानून जैसे पेशेवर पाठ्यक्रमों में नियमित कक्षाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यहां केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि व्यवहारिक समझ और संवाद कौशल भी विकसित किए जाते हैं। वहीं छात्रों के एक वर्ग का मानना है कि कई बार इंटर्नशिप, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और अन्य शैक्षणिक गतिविधियों के कारण उपस्थिति प्रभावित होती है। ऐसे में इस मुद्दे पर संतुलित नीति की आवश्यकता है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि न्यूनतम उपस्थिति को लेकर नियमों में ढील मिलने की संभावना फिलहाल नहीं दिख रही है।
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