UGC नियमों पर फंसी BJP: अगड़े नाराज, पिछड़े सशंकित, चुनाव से पहले बनाई समीक्षा कमेटी

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए समता नियमों ने भारतीय जनता पार्टी को चुनाव से ठीक पहले दोराहे पर ला खड़ा किया है। एक तरफ सवर्ण समाज नियमों के दुरुपयोग को लेकर सड़कों पर है, तो दूसरी तरफ दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग इन नियमों को अपनी सुरक्षा की ढाल मान रहा है। इसी सियासी दबाव के बीच केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में बताया कि वह इन नियमों की समीक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाने जा रही है। सरकार के इस कदम के बाद यूपी समेत उन राज्यों में सियासत तेज हो गई है। जहां अगले कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने हैं।
क्या है पूरा विवाद?
उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए UGC ने 2026 के नए नियम जारी किए थे। पहले 2012 के नियमों में सिर्फ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए सुरक्षा के प्रावधान थे। नए नियमों में अन्य पिछड़ा वर्ग को भी इस दायरे में जोड़ दिया गया। सवर्ण संगठनों का कहना है कि नियमों में शिकायत गलत पाए जाने पर शिकायतकर्ता के खिलाफ कार्रवाई या जुर्माने का कोई साफ प्रावधान नहीं है। इसी बात को लेकर विरोध शुरू हुआ। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “ओबीसी को जोड़ने पर किसी को एतराज नहीं था। दिक्कत इस बात पर है कि झूठी शिकायत पर क्या होगा, इसका जवाब नियमों में नहीं था। अब यह मुद्दा हमारे लिए ऐसा बन गया है, जिसे न संभालते बन रहा है, न छोड़ते।”
यूपी में क्यों है सबसे ज्यादा बेचैनी?
उत्तर प्रदेश की सियासत के लिहाज से यह मुद्दा सबसे नाजुक है। राज्य में करीब 22 फीसदी सवर्ण, 43 फीसदी ओबीसी और 21 फीसदी अनुसूचित जाति के मतदाता हैं।2022 में दोबारा सत्ता में लौटी भाजपा न तो सवर्णों की नाराजगी मोल ले सकती है और न ही अपनी सोशल इंजीनियरिंग के मुख्य स्तंभ ओबीसी वर्ग को खो सकती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा की सीटें 62 से घटकर 33 पर आ गई थीं। इसके बाद पार्टी हर जातीय समीकरण को लेकर अतिरिक्त सतर्क है।हाल में अगस्त में बिहार के बांकीपुर और मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव में सवर्णों की नाराजगी के कारण भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। पार्टी के अंदर माना जा रहा है कि यही नाराजगी यूपी में भारी पड़ सकती है।
भाजपा ने दी सफाई, विपक्ष ने कसा तंज
भाजपा नेताओं को डर है कि समीक्षा के ऐलान से पिछड़ा और दलित वर्ग यह न मान बैठे कि सरकार उनके अधिकारों को कमजोर कर रही है। यूपी भाजपा प्रभारी विनोद तावड़े ने सोशल मीडिया पर सफाई दी। कि कमेटी का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी वर्ग के छात्र के साथ कोई असंतुलन या भेदभाव न हो। दूसरी तरफ, इस पूरे विवाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका भी सामने आई है। इंदौर में हुई संघ की बैठक के बाद राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि संघ का मानना था कि UGC का यह सर्कुलर असंतुलित था। जमीनी फीडबैक के आधार पर सरकार का ध्यान इस ओर दिलाया गया था, जिसके बाद सरकार और यूजीसी ने इसका संज्ञान लिया।
अब मामला कोर्ट में
अब मामला कोर्ट में है और सरकार समीक्षा समिति बना रही है।विपक्ष ने सरकार के इस कदम को चुनाव से प्रेरित बताया है। शिवसेना (यूबीटी) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों के डर से ही सरकार को सुप्रीम कोर्ट में जाकर समिति बनाने की बात कहनी पड़ी, वरना अब तक सरकार इन दिशा-निर्देशों को लागू करने की तैयारी में थी।अब आगे क्या?अब सबकी नजर समीक्षा समिति पर है। समिति यह तय करेगी कि नियमों में क्या बदलाव होगा, झूठी शिकायत पर क्या कार्रवाई होगी और सभी वर्गों के छात्रों के हितों का संतुलन कैसे बनेगा।तब तक के लिए भाजपा के लिए यह मुद्दा चुनावी परीक्षा से कम नहीं है -एक तरफ नाराज सवर्ण, दूसरी तरफ सशंकित पिछड़े और दलित।
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