सलाखों के पीछे बदल रही तकदीर: गोरखपुर जेल में एक बंदी पढ़ा रही है, दूसरी सिखा रही है हुनर

जेल की ऊंची दीवारें, लोहे की सलाखें और बंद दरवाजे... आमतौर पर इनका नाम सुनते ही सजा और सन्नाटे की तस्वीर उभरती है। लेकिन गोरखपुर जिला जेल की महिला बैरक में जिंदगी का एक बिल्कुल अलग रंग देखने को मिल रहा है। यहां कोई अक्षर ज्ञान सीख रही है तो कोई हुनर के सहारे जेल से बाहर निकलने के बाद नई शुरुआत का सपना बुन रही है। खास बात यह है कि कभी अपने-अपने चर्चित मामलों को लेकर सुर्खियों में रहीं कुछ महिला बंदी अब दूसरी बंदियों के लिए सीखने और आगे बढ़ने का जरिया बन गई हैं।
पीएचडी बंदी बनी शिक्षिका, वसूली आरोपी बनी ट्रेनर
करोड़ों की जालसाजी के मामले में बंद पीएचडी धारक गरिमा सिंह अब महिला बंदियों और उनके साथ रह रहे बच्चों को पढ़ा रही हैं। वहीं, पुलिसकर्मियों से वसूली के मामले में जेल में बंद अंशिका सिंह ब्यूटीशियन का प्रशिक्षण दे रही हैं। शिक्षिका की आत्महत्या के मामले में बंद निलंबित बीएसए शालिनी श्रीवास्तव महिला बंदियों को सरकारी योजनाओं की जानकारी दे रही हैं। जेल प्रशासन ने महिला बंदियों को रिहाई के बाद रोजगार से जोड़ने के लिए कई संस्थाओं के सहयोग से प्रशिक्षण शुरू कराया है। रोटरी क्लब यूथोरिया की ओर से प्रेमलता सिंह के माध्यम से ब्यूटीशियन का कोर्स कराया जा रहा है। जेल सूत्रों के मुताबिक, अंशिका खुद भी अच्छी ब्यूटीशियन हैं। ऐसे में वह अपने अनुभव से दूसरी बंदियों को प्रशिक्षण दे रही हैं।
सिलाई-कढ़ाई सिखाई जा रही
वहीं, एसीएम सहयोगी संस्था की ओर से सिलाई-कढ़ाई सिखाई जा रही है। प्रशिक्षण लेने वाली कुछ महिलाएं अब बैरक में दूसरी बंदियों के कपड़े सिलने में सहयोग कर रही हैं। कई महिलाएं खाना बनाने में भी हाथ बंटाती हैं।त्योहारों पर बैरक बन जाता है परिवारमहिला बैरक में बंदियों के बीच आपसी तालमेल भी खास है। तीज, होली, दिवाली और करवाचौथ जैसे त्योहार मिल-जुलकर मनाए जाते हैं। महिला बंदी रक्षक भी इस आयोजन का हिस्सा बनती हैं। धीरे-धीरे उनके बीच ऐसा अपनापन बन गया है कि त्योहारों पर बैरक का माहौल परिवार जैसा नजर आता है।
73 महिला बंदियों के साथ छह बच्चे भी
जिला जेल में इस समय 73 महिला बंदी हैं। इनके साथ छह बच्चे भी रह रहे हैं। इनमें से दो बच्चे सेंट एंथोनी स्कूल में पढ़ने जाते हैं। जेल में पढ़ाई और प्रशिक्षण की गतिविधियां बंदियों के साथ रह रहे बच्चों के लिए भी सकारात्मक माहौल बनाने की कोशिश हैं। जेल अधीक्षक डीके पांडेय ने बताया कि महिला बंदियों को जेल से बाहर निकलने के बाद आत्मनिर्भर बनाने का िनर्णय। इसके लिए विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से ब्यूटीशियन और सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण दिलाया जा रहा है। पढ़ाई, प्रशिक्षण और अन्य रचनात्मक गतिविधियों से उन्हें सकारात्मक माहौल देने का प्रयास है।
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