डीडीयू में शांति पत्रकारिता पर हुई चर्चा: शांति स्थापना का माध्यम बन सकती है पत्रकारिता, युद्ध से जर्जर विश्व को बुद्ध की जरूरत

गोरखपुर|

डीडीयू गोरखपुर यूनिवर्सिटी में गांधी जयंती की पूर्व संध्या पर शांति पत्रकारिता पर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि पत्रकारिता को संघर्षों के चित्रण तक सीमित रखने के बजाय अशांति के कारणों की पहचान और समाधान की दिशा में भी काम करना चाहिए।

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के पूर्व कुलपति प्रो. राममोहन पाठक ने कहा कि दुनिया में शांति स्थापित होने पर ही विकास और उपलब्धियों का महत्व अधूरा रहेगा। पत्रकारिता शांति स्थापना का माध्यम बन सकती है। उन्होंने कहा कि गांधीजी की पत्रकारिता शांति पत्रकारिता का अनुपम उदाहरण है। गांधीजी शांति के मूर्तिमान स्वरूप थे। उनकी यह दृष्टि पत्रकारिता में भी दिखाई देती थी। उन्होंने जिस शांति की स्थापना का प्रयास किया, उसकी आज भी प्रासंगिकता है। प्रो. पाठक ने कहा कि गांधी की शांति अवधारणा बुद्ध से प्रेरित थी। युद्ध से जर्जर विश्व के लिए आज बुद्ध की जरूरत है।

वाररूम की जगह पीसरूम बनाने पर जोर

प्रो. पाठक ने राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में कहा कि राजनीतिक दलों को रणनीति बनाने के लिए वाररूम के बजाय पीसरूम बनाने चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षता कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. राजवंत राव ने की। उन्होंने कहा कि शांति पत्रकारिता नई अवधारणा नहीं बल्कि प्राचीन विचार है। पत्रकारिता का उद्देश्य शांति स्थापना में योगदान देना रहा है। गांधीजी की पत्रकारिता से पत्रकारों को प्रेरणा लेनी चाहिए।

गांधी का दृष्टिकोण आज भी प्रासंगिक

विभागाध्यक्ष प्रो. विमलेश कुमार मिश्र ने कहा कि गांधीजी की प्रासंगिकता कालजयी है। संघर्षों से जूझती दुनिया में पत्रकारिता और जनसंचार माध्यम तनाव घटाने और शांति स्थापना में भूमिका निभा सकते हैं। पत्रकारिता पाठ्यक्रम के समन्वयक प्रो. राजेश कुमार मल्ल ने आभार जताया। संचालन डॉ. रजनीश कुमार चतुर्वेदी ने किया। इस अवसर पर प्रो. प्रत्यूष दुबे, डॉ. राम नरेश राम, डॉ. अभिषेक शुक्ल, डॉ. अखिल मिश्र, डॉ. अन्वेषण सिंह और अभय शुक्ल मौजूद रहे।

नव्य जागरण

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