कानपुर में 12 पुलिसकर्मियों पर एफआईआर: फर्जी मुठभेड़ मामले में हुई कार्रवाई, 1991 में मुफ्त में प्लॉट न देने पर 12 लोगों को फंसाया था

कानपुर|
फर्जी मुठभेड़ मामले में हुई कार्रवाई, 1991 में मुफ्त में प्लॉट न देने पर 12 लोगों को फंसाया था

महाराजपुर थाने में वर्ष 1991 में हुई फर्जी पुलिस मुठभेड़ के मामले में 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। आरोप है कि तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी और उनकी टीम ने राकेश पाठक समेत 12 लोगों को फर्जी मुठभेड़ दिखाकर गिरफ्तार किया था। अवैध असलहों की बरामदगी दिखाई और फर्जी मुकदमे दर्ज कराए। मामले की जांच सीआईडी की अपराध शाखा ने की थी।

चकेरी के गांधीग्राम निवासी देव प्रसाद पाठक ने शासन से शिकायत की थी कि मुफ्त में प्लॉट न देने पर तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी ने उनके छोटे भाई राकेश पाठक समेत 12 लोगों को झूठे मुकदमों में फंसाया था। शासन ने 11 फरवरी 1991 को जांच सीआईडी की अपराध शाखा, कानपुर खंड को सौंपी। तत्कालीन निरीक्षक आरपी सिंह की जांच रिपोर्ट 25 सितंबर 1995 को सीआईडी मुख्यालय, लखनऊ से अनुमोदित हुई जिसमें पुलिस की कहानी फर्जी पाई गई। एफआईआर के मुताबिक, 22 अगस्त 1991 को पुलिस ने दावा किया था कि मुखबिर की सूचना पर नर्वल मोड़ स्थित जीटी रोड पर लूट की साजिश कर रहे बदमाशों को मुठभेड़ में पकड़ा गया। 23 अगस्त की रात 12:30 बजे बदमाशों ने बबूल की डालियां डालकर ट्रक और डीसीएम रोकने की कोशिश की। इसी आधार पर महाराजपुर में दो मुकदमे दर्ज कर आरोपपत्र भेजा गया था।

चालक और खलासी ने खोली पोल

सीआईडी जांच में डीसीएम चालक उमाशंकर पासी और खलासी बृजेन्द्र सिंह के बयान अहम रहे। दोनों ने बताया कि 22 अगस्त 1991 को वे साबुन लादकर कानपुर से बनारस जा रहे थे। रामादेवी चौराहे पर एक सिपाही डीसीएम में बैठा और छह अन्य लोगों को भी बैठा लिया। डीसीएम को महाराजपुर थाने ले जाया गया। वहां पांच में से दो लोग भाग गए जबकि तीन को पकड़ लिया गया। बाद में उनसे मारपीट कर अन्य लोगों को भी लाया गया। दोनों ने कहा कि डीसीएम को नर्वल मोड़ पर बदमाशों ने नहीं रोका था। अगले दिन उनसे लिखे कागजों पर दस्तखत करा लिए गए। सीआरपीसी की धारा 164 के तहत कोर्ट में दिए बयानों में भी उन्होंने यही बात दोहराई।

घर में सोते समय उठाया

शिकायतकर्ता और गवाहों ने बताया कि राकेश पाठक, दिनेश कुमार, शिवकुमार और जगदीश द्विवेदी को घर में सोते समय उठाया गया था। राकेश के पिता सदाशिव की लाइसेंसी दोनाली बंदूक और देव प्रसाद की लाइसेंसी राइफल पुलिस ले गई और बाद में उसे बरामदगी में दिखा दिया। सीआईडी ने झूठे साक्ष्य गढ़ने, अवैध हिरासत और मारपीट के प्रथम दृष्टया साक्ष्य पाए हैं।

छह पुलिसकर्मियों की हो चुकी है मौत

इस मामले में छह पुलिसकर्मियों की मौत हो चुकी है। इसमें तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी, उपनिरीक्षक दुर्बीन सिंह, उपनिरीक्षक रमाकांत, आरक्षी राजन सिंह, उदयशंकर पांडेय और महेंद्र सिंह की मौत हो चुकी है। शेष 12 के खिलाफ आठ गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया गया है।

इन पर दर्ज की गई है प्राथमिकी

सीआईडी जांच में प्रथम दृष्टया साक्ष्य मिलने के बाद वर्ष 1991 की फर्जी मुठभेड़ के मामले में 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। इनमें सेवानिवृत्त उपनिरीक्षक बीडी सारस्वत, योगेंद्र नाथ सिंह और रमेश चंद्र भटोले, सेवानिवृत्त हेड कांस्टेबल हृदय नारायण तिवारी तथा सेवानिवृत्त आरक्षी तेज नारायण तिवारी, बैजनाथ, चंद्रबली, विद्याकांत शुक्ला, रामआसरे और जागेश्वर यादव शामिल हैं। इनके अलावा आरक्षी बृजेश कुमार और रमेश कुमार तिवारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई है।

नव्य जागरण

पूरी खबर पढ़ें ऐप पर

ऐप डाउनलोड करने के लिए QR कोड
ऐप डाउनलोड करने के लिए QR स्कैन करें

अधूरी नहीं! पूरी खबर पढ़ें नव्य जागरण ऐप पर

ताजा खबरें, लोकल अपडेट और ब्रेकिंग अलर्ट सीधे अपने मोबाइल पर पाएं।

फिलहाल और खबरें उपलब्ध नहीं हैं।