मेरठ के तीरंदाज नीरज चौहान ने रचा ​इतिहास: ए​शियन गेम्स में जिता कांस्य पदक, अपने ही देश के ​खिलाड़ी से था मुकाबला

मेरठ|
ए​शियन गेम्स में जिता कांस्य पदक, अपने ही देश के ​खिलाड़ी से था मुकाबला

जापान में आयोजित हो रहे एशियन गेम्स 2026 से भारत के लिए एक बेहद गौरवपूर्ण खबर सामने आई है। उत्तर प्रदेश के मेरठ के रहने वाले 24 वर्षीय तीरंदाज नीरज चौहान ने पुरुषों की व्यक्तिगत रिकर्व स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया है। इस प्रतियोगिता में नीरज का यह दूसरा पदक है, इससे पहले वे टीम स्पर्धा में रजत पदक भी अपने नाम कर चुके हैं। नीरज एशियन गेम्स के इतिहास में व्यक्तिगत रिकर्व में पदक जीतने वाले तरुंदीप राय के बाद केवल दूसरे भारतीय पुरुष खिलाड़ी बने हैं।

शनिवार को खेले गए बेहद रोमांचक और दिल थाम देने वाले ब्रॉन्ज मेडल मुकाबले में नीरज चौहान का सामना अपने ही देश के शीर्ष तीरंदाज धीरज बोम्मादेवरा से था। ऑल-इण्डिया मुकाबले में एक समय नीरज 2-4 से पीछे चल रहे थे, लेकिन उन्होंने गजब का मानसिक संतुलन दिखाया। चौथे सेट में परफेक्ट 30 का स्कोर बनाकर उन्होंने मैच को बराबरी पर ला खड़ा किया और आखिरी सेट में शानदार 10 का निशाना लगाते हुए धीरज को 6-4 से शिकस्त दी।

स​ब्जियां बेचकर निकाला तीरंदाजी का खर्च

नीरज की इस स्वर्णिम सफलता के पीछे उनके पिता अक्षयलाल चौहान का कड़ा संघर्ष और त्याग छुपा है। साल 2020 में कोरोना महामारी के लॉकडाउन के दौरान उनके पिता ने मेरठ के कैलाश प्रकाश स्टेडियम में रसोइये की अपनी नौकरी खो दी थी। घर की माली हालत बेहद खराब हो गई थी और तीरंदाजी जैसे महंगे खेल को जारी रखना नामुमकिन सा लग रहा था।

ऐसी विकट परिस्थितियों में भी परिवार ने हार नहीं मानी। नीरज और उनके बड़े भाई सुनील ने मेरठ के सिविल लाइंस इलाके की गलियों में ठेले पर घूम-घूमकर सब्जियां बेचीं ताकि पिता का हाथ बंटाया जा सके और तीरंदाजी की ट्रेनिंग का खर्च निकाला जा सके।

नीरज ने पिता को समर्पित किया मेडल

जैसे ही जापान से नीरज के पदक जीतने की खबर मेरठ पहुंची, पूरे घर में जश्न का माहौल हो गया। बेटे के संघर्षों को याद कर मां की आंखें खुशी के आंसुओं से नम हो गईं। नीरज ने अपनी इस ऐतिहासिक जीत के बाद बेहद भावुक होते हुए कहा- "सेमीफाइनल की हार के बाद खुद को संभालना मुश्किल था, लेकिन तब मुझे वो दिन याद आए जब मैंने और मेरे भाई ने मेरठ की सड़कों पर सब्जी का ठेला खींचा था। वह मेरी जिंदगी का सबसे कठिन दौर था, जब मैं उससे बाहर निकल सकता हूं तो यहां मेडल भी जीत सकता हूं। मैं यह पदक अपने पिता को समर्पित करता हूं। उन्होंने मेरा समर्थन करने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।"

युवाओं के लिए बने प्रेरणा

नीरज चौहान की यह ऐतिहासिक सफलता स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के 'टॉप्स' डेवलपमेंट एथलीट प्रोग्राम का भी हिस्सा रहने के दौरान आई है। उनकी यह कहानी करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो अभावों के बीच भी सफलता का लक्ष्य भेदा जा सकता है।

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