हाईकोर्ट ने मृत्यु पूर्व बयान को ठहराया सुसंगत: कहा-गवाहों के मुकर जाने से नहीं मिल सकती राहत, संदेह व्यक्त करने के लिए ठोस आधार का होना जरूरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के मुकर जाने मात्र से मृत्यु पूर्व बयान को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि मृत्यु पूर्व बयान पर संदेह व्यक्त करने के लिए किसी ठोस आधार का होना जरूरी है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने बरेली के एक मामले में आरोपी पति और सास-ससुर की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए उनकी अपील को खारिज कर दिया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और हत्या के एक मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाए गए आजीवन कारावास के फैसले को सही ठहराया है। कोर्ट ने साफ किया कि अगर मरने वाले का बयान स्वैच्छिक, सत्य और विश्वसनीय है, तो केवल गवाहों के मुकर जाने से आरोपी को राहत नहीं मिल सकती।
तकनीकी बातों से कहानी को झुठलाया नहीं जा सकता
हाईकोर्ट ने पाया कि मृतका का मृत्यु पूर्व बयान पूरी तरह सुसंगत था। अदालत के मुताबिक, अस्पताल पहुंचाने के तरीकों में मामूली अंतर होने जैसी तकनीकी बातों से अभियोजन की पूरी कहानी को झुठलाया नहीं जा सकता। कोर्ट ने इस बात को रेखांकित किया कि मृतका के आखिरी बयान की पुष्टि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और चश्मदीदों की शुरुआती गवाही से पूरी तरह होती है। यह पूरा मामला बरेली जिले का है, जहां विवाहिता को प्रताड़ित कर मार दिया गया था। निचली अदालत ने आरोपियों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने भी सही माना है।
मृत्यु पूर्व बयान सजा का बन सकता है एकमात्र आधार
भारतीय साक्ष्य कानून के तहत, मृत्यु पूर्व बयान अपने आप में सजा का एकमात्र आधार बन सकता है, बशर्ते वह बिना किसी दबाव, सिखाए-पढ़ाए या बहकावे में आए बिना होशोहवास की स्थिति में दिया गया हो। इस मामले में भी कोर्ट ने पाया कि बयान देते समय पीड़िता मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ थी।
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