वाराणसी में UP ATS ने नक्सली कमांडर को किया ढेर: कमांडो पर दागी गोलियां, 8 साल से तलाश रही थी NIA

वाराणसी|21 घंटे पहले
कमांडो पर दागी गोलियां, 8 साल से तलाश रही थी NIA

यूपी ATS ने रविवार सुबह मुठभेड़ में 30 लाख रुपये के इनामी नक्सली कमांडर बृजेश गंझू उर्फ गोपाल सिंह को मार गिराया। रामनगर थाना क्षेत्र में हुई कार्रवाई के दौरान बृजेश ने घिरने के बाद ATS टीम पर फायरिंग कर दी। उसकी गोली DSP विपिन राय और हेड कॉन्स्टेबल नितेंद्र कृष्ण की बुलेटप्रूफ जैकेट पर लगी। जवाबी कार्रवाई में बृजेश को गोली लगी। उसे जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। उसका एक साथी मौके से फरार हो गया।

ATS के DSP विपिन राय के मुताबिक, रविवार सुबह करीब चार बजे सूचना मिली थी कि बृजेश रामनगर के रास्ते मुगलसराय की ओर जाने वाला है। इसके बाद कमांडो टीम ने इलाके में घेराबंदी कर दी। इसी दौरान बृजेश एक साथी के साथ बाइक से वहां पहुंचा। टीम ने उसे रुकने का इशारा किया। पकड़े जाने के डर से उसने दोनों हाथों में पिस्टल लेकर फायरिंग शुरू कर दी। गोलियां अधिकारियों की बुलेटप्रूफ जैकेट पर लगीं। इसके बाद ATS ने जवाबी फायरिंग की, जिसमें बृजेश घायल होकर सड़क पर गिर गया।

कमांडो पर दागी गोलियां, 8 साल से तलाश रही थी NIA

पुलिस ने इलाके में बढ़ाई सुरक्षा

मुठभेड़ के बाद ATS ने बृजेश के पास से दो पिस्टल बरामद कीं। मौके से कई जिंदा कारतूस और खोखे भी मिले हैं। घायल बृजेश को अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन उसकी जान नहीं बच सकी। शव को लाल बहादुर शास्त्री पोस्टमॉर्टम हाउस में रखवाया गया है। ADG कानून व्यवस्था अमिताभ यश के मुताबिक, कार्रवाई के बाद ATS और स्थानीय पुलिस ने इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी है।

ट्रांसपोर्टरों और कोयला कंपनियों से वसूली का आरोप

46 वर्षीय बृजेश झारखंड के चतरा जिले के लावालौंग थाना क्षेत्र के लूटू गांव का रहने वाला था। उस पर ट्रांसपोर्टरों, कोयला खनन कंपनियों और ठेकेदारों से वसूली करने का आरोप था। झारखंड सरकार ने उस पर 25 लाख और NIA ने पांच लाख रुपये का इनाम घोषित किया था। करीब आठ साल पहले टेरर फंडिंग केस में NIA ने उसे वांटेड घोषित किया था। इसके बाद उसके घर की कुर्की भी की गई थी।

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कई नामों से बदलता रहा ठिकाना

बृजेश लंबे समय से वह नाम और ठिकाने बदलकर रह रहा था। पुलिस रिकॉर्ड में उसके गोपाल सिंह भोक्ता, दुलारचंद गंझू, रंजन, फुलचंद गंझू और सरदार जैसे नाम दर्ज हैं। उसके पिता पंचू गंझू की काफी पहले मौत हो चुकी थी। अकेले चतरा जिले में उसके खिलाफ 39 केस दर्ज थे।

2004 में अलग गुट बनाकर बढ़ाया नेटवर्क

बृजेश पहले बीड़ी पत्ता के ठेकेदारों से वसूली करता था। सीसीएल की आम्रपाली और मगध कोयला परियोजनाएं शुरू होने के बाद उसने कोयला खनन से जुड़ी कंपनियों को भी निशाना बनाया। वर्ष 2004 में उसने नक्सली संगठन भाकपा माओवादी से अलग होकर अपना गुट बनाया। धीरे-धीरे चतरा, रांची और हजारीबाग समेत झारखंड के कई जिलों में नेटवर्क फैलाया। बिहार के कुछ हिस्सों तक भी उसका नेटवर्क पहुंचा। वर्ष 2010 में वह लावालौंग पंचायत से निर्विरोध मुखिया चुना गया था। इसके बाद करीब 20 साल तक TSPC और माओवादियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई चलती रही।

नव्य जागरण

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