सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: समझौते के बाद लोन डिफॉल्टर्स पर नहीं चलेगा केस, आपराधिक कार्रवाई जारी रखना न्याय के खिलाफ

बैंकिंग और वित्तीय विवादों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया। कोर्ट ने कहा है कि यदि बैंक और कर्जदार आपसी सहमति से ऋण खाते का निपटारा कर लेते हैं, तो उसके बाद उसी मामले में आपराधिक कार्रवाई जारी रखना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि समझौते के बाद आपराधिक केस चलाना न केवल दमनकारी होगा। इससे देश के कारोबारी माहौल और आर्थिक गतिविधियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने एक कारोबारी की याचिका पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान उसके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि बैंकिंग लेन-देन मूल रूप से एक व्यावसायिक और वित्तीय प्रकृति का मामला होता है। जब दोनों पक्ष आपसी सहमति से विवाद का समाधान कर लेते हैं। बकाया राशि का निपटारा हो जाता है, तब उसी प्रकरण में आपराधिक कार्रवाई को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।
डीआरटी में हुआ था समझौता, फिर दर्ज हुआ केस
मामले के अनुसार संबंधित कारोबारी ने बैंक के साथ डेब्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल (डीआरटी) के समक्ष समझौता किया था। इस समझौते के तहत 6.49 करोड़ रुपये के बकाये के मुकाबले 4.25 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था। जिसमें लगभग 3.09 करोड़ रुपये ब्याज की राशि भी शामिल थी। समझौते के बाद दोनों पक्षों के बीच वित्तीय विवाद समाप्त हो गया था। समझौते के करीब दो वर्ष बाद बैंक ने कारोबारी के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी का केस दर्ज करा दिया। जांच एजेंसी सीबीआई ने आरोप लगाया कि कारोबारी ने कथित रूप से ऑडिट रिपोर्ट की फर्जी प्रतियों के आधार पर अपनी कैश क्रेडिट लिमिट बढ़वाई थी। इसके बाद मामले में चार्जशीट भी दाखिल की गई।
'मुकदमा जारी रखना होगा अन्याय'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब संबंधित पक्षों के बीच विवाद का निपटारा हो चुका है। बैंक को उसकी देय राशि प्राप्त हो चुकी है, तब आरोपी के दोषसिद्ध होने की संभावना बेहद कम रह जाती है। ऐसे में केस को जारी रखना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत होगा। अदालत ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई से अनावश्यक मुकदमेबाजी बढ़ेगी। न्यायिक संसाधनों पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
आर्थिक गतिविधियों पर पड़ेगा असर
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यदि डीआरटी या अन्य वैधानिक मंचों पर हुए समझौतों के बाद भी आपराधिक केस जारी रखने की अनुमति दी जाती है, तो कारोबारी और उद्यमी विवादों के समाधान के लिए आगे आने से बचेंगे। इससे बैंकिंग क्षेत्र में समझौता आधारित निपटान की प्रक्रिया प्रभावित होगी। इसका व्यापक असर आर्थिक गतिविधियों तथा निवेश के माहौल पर पड़ सकता है। कोर्ट ने माना कि वित्तीय विवादों के समाधान को प्रोत्साहित करना अर्थव्यवस्था के हित में है।
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