सुप्रीम कोर्ट की बैंकिंग व्यवस्था पर टिप्पणी: बड़े कर्जदारों को छूट; आम जनता पर सख्ती, बिना जांच के बड़े लोन हो जाते पास

नई दिल्ली|1 घंटा पहले
बड़े कर्जदारों को छूट; आम जनता पर सख्ती, बिना जांच के बड़े लोन हो जाते पास

देश की बैंकिंग व्यवस्था और लोन वितरण प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, विशेषकर भारतीय स्टेट बैंक की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक ओर आम नागरिकों को छोटी राशि का लोन प्राप्त करने के लिए लंबी और जटिल प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर बड़े कॉरपोरेट समूहों और कंपनियों को पर्याप्त जांच-पड़ताल के बिना भारी-भरकम लोन मंजूर कर दिए जाते हैं। कोर्ट ने इस प्रवृत्ति को चिंताजनक बताया है। कोर्ट ने कहा कि इससे बैंकिंग व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। आम लोगों में असंतोष पैदा होता है।

न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की खंडपीठ एक ऋण चूक (डिफॉल्ट) से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि बैंकिंग क्षेत्र में दोहरे मानदंड दिखाई दे रहे हैं। आम व्यक्ति जब अपनी व्यक्तिगत जरूरतों के लिए लोन लेने पहुंचता है, तब उसे कई स्तर की औपचारिकताओं, दस्तावेजी प्रक्रियाओं और कठोर शर्तों का सामना करना पड़ता है। वहीं, बड़े लोन के मामलों में अक्सर आवश्यक सतर्कता और जोखिम मूल्यांकन की अनदेखी कर दी जाती है।

आठ करोड़ के लोन मामले पर सुनवाई

मामला हरियाणा की एक कंपनी से जुड़ा है। कंपनी ने वर्ष 2019 में एसबीआई से करीब 8.09 करोड़ रुपये का लोन प्राप्त किया था। कोर्ट में प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार, कंपनी ने लोन मिलने के बाद एक भी किस्त जमा नहीं की। कुछ ही महीनों में उसका खाता गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित हो गया। करीब छह वर्ष बाद कंपनी ने कोर्ट में यह प्रस्ताव रखा कि वह केवल मूल धनराशि लौटाने को तैयार है। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा कि यह न तो पर्याप्त है और न ही समय पर किया गया प्रयास माना जा सकता है। कोर्ट ने बैंक को कंपनी की संपत्तियों की रिकवरी और कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाने की अनुमति दी। लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि इस पूरे प्रकरण में बैंक अधिकारियों की भूमिका और लापरवाही पर भी गंभीर प्रश्न उठते हैं।

लोन स्वीकृति और रिकवरी प्रक्रिया पर चिंता

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोन वितरण और वसूली की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, संतुलित और मानवीय बनाने की आवश्यकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह नियमों को कमजोर करने की बात नहीं कर रही है। यह सुनिश्चित करना चाहती है कि आम नागरिकों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े। खंडपीठ ने कहा कि यदि कोई कंपनी लोन लेने के तुरंत बाद डिफॉल्ट कर जाती है, तो यह संकेत देता है कि लोन स्वीकृति से पहले उसकी वित्तीय स्थिति और भुगतान क्षमता का समुचित मूल्यांकन नहीं किया गया था। ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

उच्च प्रबंधन तक पहुंचाने के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआई की ओर से उपस्थित अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे से कहा कि कोर्ट की चिंताओं और टिप्पणियों को बैंक के शीर्ष प्रबंधन तक पहुंचाया जाए। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि फिलहाल वह कोई नया दिशा-निर्देश जारी नहीं कर रही है। लेकिन भविष्य में यदि इसी तरह की लापरवाही या असंतुलित बैंकिंग व्यवहार सामने आता है तो कोर्ट अधिक कठोर रुख अपना सकता है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब बैंकिंग क्षेत्र में बढ़ते एनपीए, ऋण वसूली और वित्तीय जवाबदेही को लेकर लगातार बहस चल रही है। कोर्ट के इस रुख को बैंकिंग व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है।

नव्य जागरण

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