जमानत याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: जल्द सुनवाई की जरूरत बताई, चार करोड़ 84 लाख केस लंबित

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने जमानत मामलों पर बड़ी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट में बेल याचिकाओं का दबाव बढ़ रहा है। कई मामलों में सुनवाई और फैसले में लंबा समय लग रहा है। इससे लोगों के मौलिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि अब मजबूत और आधुनिक व्यवस्था जरूरी है। जमानत याचिकाओं की जल्द सुनवाई सुनिश्चित करनी होगी। इसके लिए ऑटोमैटिक लिस्टिंग सिस्टम तैयार किया जाना चाहिए। अदालत ने मामलों के निपटारे की समय सीमा तय करने का सुझाव भी दिया।
यह टिप्पणी चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने की। दोनों जजों ने कहा कि न्याय में देरी गंभीर समस्या बनती जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल अदालतों की जिम्मेदारी काफी नहीं है। हाईकोर्ट, राज्य सरकारें और जांच एजेंसियां मिलकर काम करें। ऐसा सिस्टम बनाया जाए जिससे बेल मामलों में देरी कम हो। कोर्ट ने साफ किया कि उसका मकसद किसी हाईकोर्ट की आलोचना करना नहीं है। अदालत केवल व्यवस्था को ज्यादा प्रभावी बनाना चाहती है। बेंच ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 बेहद महत्वपूर्ण है। यह हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इसलिए जमानत मामलों में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि पीड़ितों के अधिकारों की अनदेखी नहीं हो सकती। न्याय प्रक्रिया में उनका हित भी सुरक्षित रहना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने मांगा था पूरा डेटा
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही जानकारी जुटा चुका है। अदालत ने सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से रिपोर्ट मांगी थी। उनसे लंबित नियमित और अग्रिम जमानत याचिकाओं का डेटा मांगा गया। कोर्ट ने पूछा था कि याचिका कब दाखिल हुई। सुनवाई किस तारीख को हुई। फैसला लंबित है या नहीं। अदालत ने मामलों की पूरी स्थिति जाननी चाही थी। सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि ज्यादातर हाईकोर्ट ने आंकड़े उपलब्ध करा दिए हैं। कई अदालतों ने पेंडिंग मामलों को तेजी से निपटाना भी शुरू कर दिया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट पर विशेष टिप्पणी
इलाहाबाद हाईकोर्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने विशेष चिंता जताई। अदालत ने कहा कि वहां जमानत याचिकाओं की संख्या बहुत ज्यादा है। कोर्ट ने माना कि वहां के जज लगातार भारी दबाव में काम कर रहे हैं। रोज सैकड़ों मामलों की सुनवाई की जा रही है। इसके बावजूद लंबित मामलों का बोझ कम नहीं हो रहा। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को सुझाव दिया। अदालत ने कहा कि बेल मामलों की पहले से तय तारीख दी जाए। इससे सुनवाई प्रक्रिया ज्यादा व्यवस्थित हो सकती है।
पीड़ितों की भागीदारी जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों की भूमिका पर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि खासकर NDPS मामलों में जांच बेहद महत्वपूर्ण होती है। नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों में FSL रिपोर्ट समय पर आनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी अपनी जिम्मेदारी गंभीरता से निभाएं। पीड़ितों को हर सुनवाई की जानकारी दी जाए। उन्हें कानूनी सहायता लेने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। अदालत ने साफ कहा कि न्याय प्रक्रिया केवल आरोपी तक सीमित नहीं है। पीड़ित पक्ष की भागीदारी भी जरूरी है।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट मामले में हुई सुनवाई
यह पूरा मामला एक याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिका में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। उसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की स्थिति पर चिंता जताई। इससे पहले चार फरवरी को भी अदालत निर्देश दे चुकी है। तब सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से सहयोग मांगा था। अदालत ने कहा था कि हाईकोर्ट को बेल मामलों में मदद मिलनी चाहिए।
देशभर की अदालतों में भारी लंबित मामले
सरकारी आंकड़े न्याय व्यवस्था पर दबाव दिखाते हैं। आठ दिसंबर 2025 तक सुप्रीम कोर्ट में 90 हजार से ज्यादा मामले लंबित थे। देश के 25 हाईकोर्ट में करीब 63 लाख मामले पेंडिंग हैं। निचली अदालतों में यह आंकड़ा और ज्यादा है। वहां करीब चार करोड़ 84 लाख मामले लंबित बताए गए हैं। हालांकि जमानत याचिकाओं का सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। दक्ष डेटाबेस के मुताबिक हर साल चार लाख से ज्यादा बेल याचिकाएं दायर होती हैं। यही वजह है कि अदालतें अब तेज और डिजिटल सिस्टम की जरूरत महसूस कर रही हैं।
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