तेजी से बढ़ रहा टेलीफोबिया: कॉल रिसीव से डरने लगे हैं लोग, फोन बजते ही बढ़ने लगती है बेचैनी

1 घंटा पहले
कॉल रिसीव से डरने लगे हैं लोग, फोन बजते ही बढ़ने लगती है बेचैनी

डिजिटल दौर में जहां लोगों की बातचीत का बड़ा हिस्सा चैटिंग, सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स तक सीमित हो गया है। वहीं फोन कॉल करने या रिसीव करने में झिझक और घबराहट महसूस करने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ रही है। इसी मानसिक स्थिति को टेलीफोबिया या फोन एंग्जायटी कहा जाता है। यह केवल सामान्य संकोच नहीं है। एक प्रकार का एंजाइटी डिसऑर्डर माना जाता है। इसमें व्यक्ति फोन पर बातचीत से बचने लगता है और कॉल आते ही तनाव महसूस करता है। एक्सपर्ट्स के अनुसार यह समस्या विशेष रूप से डिजिटल पीढ़ी Gen Z में अधिक देखने को मिल रही है। हालांकि, यह किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है।

टेलीफोबिया ऐसी मानसिक स्थिति है। इसमें व्यक्ति फोन कॉल करने या रिसीव करने के दौरान असहजता, घबराहट और तनाव महसूस करता है। कई लोगों में यह डर इतना बढ़ जाता है कि वे जरूरी बातचीत भी फोन के बजाय मैसेज या ईमेल के माध्यम से करना पसंद करते हैं। कई बार फोन बजने के बावजूद वे कॉल रिसीव नहीं करते या बाद में जवाब देने का प्रयास करते हैं। यह व्यवहार केवल आदत नहीं, बल्कि मानसिक दबाव का संकेत भी हो सकता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि डिजिटल माध्यमों पर बढ़ती निर्भरता, आमने-सामने संवाद की घटती आदत और तत्काल जवाब देने के दबाव ने इस समस्या को पहले की तुलना में अधिक सामान्य बना दिया है। यही कारण है कि हाल के वर्षों में "टेलीफोबिया" शब्द तेजी से चर्चा में आया है।

इन संकेतों से पहचानें टेलीफोबिया

टेलीफोबिया से प्रभावित व्यक्ति में कुछ सामान्य लक्षण दिखाई देते हैं। फोन की घंटी बजते ही घबराहट महसूस होना, कॉल रिसीव करने से बचना, फोन पर बात करने से पहले अत्यधिक चिंता होना, कॉल की बजाय मैसेज या ईमेल को प्राथमिकता देना, बातचीत के दौरान पसीना आना या दिल की धड़कन तेज होना और महत्वपूर्ण फोन कॉल को बार-बार टालना इसके प्रमुख संकेत माने जाते हैं। यदि ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें और दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगें, तो इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता होती है।

किन कारणों से बढ़ता है यह डर

एक्सपर्ट्स के अनुसार टेलीफोबिया के पीछे कई मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक कारण हो सकते हैं। सोशल एंग्जायटी, आत्मविश्वास की कमी, गलत बोलने या दूसरों द्वारा जज किए जाने का डर, पहले का कोई नकारात्मक फोन अनुभव और डिजिटल मैसेजिंग पर अत्यधिक निर्भरता इसकी प्रमुख वजहों में शामिल हैं। लगातार टेक्स्ट आधारित संवाद की आदत होने से कई लोगों के लिए फोन पर सीधे बातचीत करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

छोटे कदमों से मिल सकती है राहत

मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट का कहना है कि इस समस्या से धीरे-धीरे बाहर निकला जा सकता है। शुरुआत छोटी और आसान फोन कॉल से करनी चाहिए। बातचीत से पहले जरूरी बिंदु लिख लेना, नियमित रूप से फोन पर बात करने का अभ्यास करना और आत्मविश्वास बढ़ाने वाली गतिविधियों में भाग लेना भी मददगार साबित हो सकता है। डर लगातार बढ़ने पर और सामान्य जीवन प्रभावित होने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित माना जाता है।

क्या केवल Gen Z ही है इसकी शिकार?

एक्सपर्ट्स के अनुसार टेलीफोबिया केवल जेन जेड तक सीमित नहीं है। लेकिन यह समस्या इस पीढ़ी में अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिल रही है। इसकी मुख्य वजह यह है कि इस पीढ़ी का अधिकांश संवाद टेक्स्ट मैसेज, सोशल मीडिया और चैटिंग के माध्यम से होता है। फोन कॉल में तत्काल प्रतिक्रिया देनी पड़ती है।वहीं, मैसेज में सोचने और जवाब तैयार करने का पर्याप्त समय मिल जाता है। यही अंतर कई युवाओं को फोन पर बातचीत के दौरान असहज महसूस कराता है। हालांकि सोशल एंग्जायटी, आत्मविश्वास की कमी या नकारात्मक संवाद अनुभव रखने वाले किसी भी आयु वर्ग के व्यक्ति में टेलीफोबिया विकसित हो सकता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि डिजिटल कम्युनिकेशन पर बढ़ती निर्भरता ने इस मानसिक समस्या को पहले की तुलना में अधिक व्यापक बना दिया है।

नव्य जागरण

पूरी खबर पढ़ें ऐप पर

ऐप डाउनलोड करने के लिए QR कोड
ऐप डाउनलोड करने के लिए QR स्कैन करेंGET IT ON Google Play

अधूरा नहीं! पूरी खबर पढ़ें नव्य जागरण ऐप पर

ताजा खबरें, लोकल अपडेट और ब्रेकिंग अलर्ट सीधे अपने मोबाइल पर पाएं।