सैनिटरी पैड और शौचालय अब छात्राओं का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने हर तीन महीने में मांगी रिपोर्ट, केंद्र की होगी सीधी निगरानी

सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में छात्राओं के लिए सैनिटरी नैपकिन और अलग शौचालय की उपलब्धता को लेकर केंद्र सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाओं की कमी के कारण किसी भी लड़की की पढ़ाई प्रभावित नहीं होनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को 30 जनवरी 2026 को दिए गए फैसले को पूरी तरह लागू कराने का निर्देश देते हुए कहा कि इस मामले की प्रगति की निगरानी अब हर तीन महीने में की जाएगी। अदालत ने केंद्र से नियमित प्रोग्रेस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि देशभर के स्कूलों में छात्राओं को आवश्यक स्वास्थ्य और स्वच्छता सुविधाएं मिल रही हैं।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से कहा कि यह मामला देश की करोड़ों लड़कियों और महिलाओं के हित से जुड़ा है। अदालत ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे से कहा कि फैसले का प्रभावी तरीके से उपयोग किया जाए और इसका लाभ अधिकतम छात्राओं तक पहुंचना चाहिए। केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि 30 जनवरी के फैसले के बाद सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस दिशा में प्रयास तेज कर दिए गए हैं और स्कूलों में सुविधाओं को बेहतर बनाने की प्रक्रिया जारी है।
राज्यों से मांगी गई विस्तृत रिपोर्ट
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पूछा कि क्या सभी राज्यों से नियमित रूप से डेटा जुटाया जा रहा है। केंद्र सरकार ने बताया कि पिछले दो से ढाई महीने का डेटा एकत्र किया गया है और राज्यों से लगातार जानकारी ली जा रही है। इस पर अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार को राज्यों का मार्गदर्शन जारी रखना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन हर स्तर पर हो। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे 15 अगस्त तक अपनी स्थिति रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दें। साथ ही स्पष्ट किया गया कि किसी भी राज्य की ओर से लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस पूरी प्रक्रिया के लिए शिक्षा मंत्रालय को नोडल मंत्रालय बनाया गया है।
पीरियड्स को बताया मौलिक अधिकार का हिस्सा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 30 जनवरी के ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख करते हुए कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में पीरियड्स का अधिकार भी शामिल है। अदालत ने माना था कि सुरक्षित, प्रभावी और सस्ती मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाएं लड़कियों को बेहतर स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन देने में अहम भूमिका निभाती हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाओं की कमी छात्राओं को शिक्षा में समान भागीदारी से वंचित करती है और इसका असर उनके सामाजिक और पेशेवर जीवन तक पड़ता है।
स्कूलों में मुफ्त सैनिटरी नैपकिन और अलग टॉयलेट के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में सभी सरकारी और निजी स्कूलों में छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। अदालत ने कहा था कि नैपकिन ऐसी जगह उपलब्ध कराए जाएं, जहां छात्राएं आसानी से पहुंच सकें। प्राथमिकता के आधार पर स्कूलों के टॉयलेट परिसर में वेंडिंग मशीनें लगाने को कहा गया था। इसके अलावा हर स्कूल में लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग शौचालय तथा पर्याप्त पानी और सफाई की व्यवस्था सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया गया था। अदालत ने संकेत दिया कि वह इस मामले में लगातार निगरानी रखेगी, ताकि जमीनी स्तर पर फैसले का असर दिखाई दे सके।
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