बीआर अंबेडकर बिहार यूनिवर्सिटी की टीम ने तैयार किया पोषक मिलेट डेयरी प्रोडक्ट: रिसर्च से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा बूस्ट, महिलाओं के लिए खास न्यूट्रिशन फोकस

02 मई 2026
रिसर्च से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा बूस्ट, महिलाओं के लिए खास न्यूट्रिशन फोकस

बीआर अंबेडकर बिहार यूनिवर्सिटी, मुजफ्फरपुर की एक मल्टी-इंस्टीट्यूशनल रिसर्च टीम ने एक नया फंक्शनल फूड प्रोडक्ट तैयार किया है। यह प्रोडक्ट बाजरा और डेयरी तत्वों के कॉम्बिनेशन से बना है। टीम का नेतृत्व कुलपति प्रोफेसर दिनेश चंद्र राय ने किया। यह रिसर्च पारंपरिक भारतीय खानपान और मॉडर्न साइंटिफिक मेथड्स का बेहतरीन मिश्रण मानी जा रही है। इसका उद्देश्य पोषण की कमी को दूर करना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है। रिसर्च जर्नल ‘फूड बायोमैक्रोमॉलिक्यूल्स’ में प्रकाशित हुई है।

इस प्रोडक्ट को खासतौर पर पोस्टमेनोपॉजल महिलाओं की न्यूट्रिशन जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। यह बाजरा आधारित लड्डू के रूप में तैयार किया गया है। इसमें घी को कैरियर के रूप में इस्तेमाल किया गया है ताकि पोषक तत्व शरीर में बेहतर तरीके से अवशोषित हो सकें। लैब टेस्ट में पाया गया कि यह लड्डू कैल्शियम और फॉस्फोरस से भरपूर है। साथ ही यह सामान्य तापमान पर 90 दिनों तक सुरक्षित रह सकता है। यह फीचर इसे लंबे समय तक स्टोरेज के लिए उपयुक्त बनाता है।

रिसर्च टीम और सहयोग

इस प्रोजेक्ट में कई संस्थानों का सहयोग रहा। क्वांटम यूनिवर्सिटी, अयोध्या के अनुद्वैत, राजीव गांधी यूनिवर्सिटी, इटानगर और सीएसजेएम यूनिवर्सिटी, कानपुर के विशेषज्ञ शामिल रहे। यह टीमवर्क पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक शोध को जोड़ने का उदाहरण बना है। प्रोफेसर राय ने बताया कि उनका लक्ष्य समाज को सपोर्ट करना और ग्रामीण इकोनॉमी को सशक्त बनाना है।

किसानों और डेयरी सेक्टर को फायदा

इस इनोवेशन से किसानों और डेयरी उत्पादकों को बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है। इससे वे कच्चे माल की सप्लाई से आगे बढ़कर वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट बना सकेंगे। इससे उनकी आमदनी में इजाफा होगा। साथ ही फूड इंडस्ट्री में नए अवसर खुलेंगे। यह मॉडल लोकल रिसोर्स को हाई-वैल्यू प्रोडक्ट में बदलने का रास्ता दिखाता है।

फूड सेक्टर के लिए नई दिशा

रिसर्च के अनुसार यह प्रोडक्ट हेल्थ मार्केट में खास जगह बना सकता है। यह मिलेट और डेयरी सेक्टर को जोड़ने का एक प्रैक्टिकल तरीका है। इससे खास समूहों की पोषण जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह प्रयास भारतीय पारंपरिक खानपान को आधुनिक बाजार से जोड़ने में मदद करेगा।

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