आरजीकर रेप-मर्डर केस में हाईकोर्ट का बड़ा एक्शन: आरोप दबाने की जांच करेगी CBI की SIT टीम, पीड़ित परिवार ने उठाए थे सवाल

बहुचर्चित आरजीकर मेडिकल कॉलेज रेप-मर्डर केस में अब एक नया और अहम मोड़ सामने आया है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने मामले में कथित तौर पर सबूत और आरोप दबाने के आरोपों की जांच के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस संवेदनशील मामले में जांच की पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। हाईकोर्ट ने एसआईटी को 25 जून तक अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है। इस फैसले को पीड़ित परिवार के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, जो लंबे समय से मामले में व्यापक साजिश और अन्य संभावित आरोपियों की भूमिका की जांच की मांग कर रहा था।
मामले में मृतक ट्रेनी डॉक्टर के माता-पिता ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया था। उन्होंने कहा कि सीबीआई ने जांच को सीमित दायरे में रखकर कई अहम पहलुओं को नजरअंदाज किया। परिवार का कहना था कि केवल एक आरोपी को दोषी ठहराकर केस को बंद करने की कोशिश की गई, जबकि घटनास्थल और परिस्थितियां किसी बड़ी साजिश की ओर इशारा करती हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी पीड़ित परिवार को कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर करने की अनुमति दी थी। अब हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मामले की दोबारा गहन जांच का रास्ता साफ हो गया है।
देशभर में उठा था आक्रोश
गौरतलब है कि आरजीकर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में 8-9 अगस्त 2024 की रात एक ट्रेनी डॉक्टर के साथ रेप के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी। अगले दिन सुबह उसकी बॉडी अस्पताल के सेमिनार हॉल में मिली थी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। कोलकाता समेत देशभर में डॉक्टरों, मेडिकल छात्रों और सामाजिक संगठनों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए थे। पश्चिम बंगाल में स्वास्थ्य सेवाएं दो महीने तक प्रभावित रहीं और सरकार पर मामले की निष्पक्ष जांच कराने का भारी दबाव बना था।
CCTV, DNA और इयरफोन बने अहम सबूत
घटना के बाद पुलिस ने CCTV फुटेज और घटनास्थल से मिले एक टूटे हुए ब्लूटूथ इयरफोन के आधार पर सिविक वॉलंटियर संजय रॉय को गिरफ्तार किया था। जांच एजेंसियों के मुताबिक आरोपी के कपड़ों पर मिले खून के धब्बे और डीएनए सैंपल पीड़िता से मैच हुए थे। इसके बाद सेशंस कोर्ट ने 20 जनवरी 2025 को संजय रॉय को उम्रकैद की सजा सुनाई। हालांकि अदालत ने इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी में नहीं माना, जिसके चलते फांसी की सजा नहीं दी गई।
जांच में कई सवाल अब भी बरकरार
मामले में मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष समेत अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया गया था। समय पर चार्जशीट दाखिल न होने के कारण कुछ आरोपियों को जमानत मिल गई। वहीं फोरेंसिक रिपोर्ट में घटनास्थल पर संघर्ष के पर्याप्त सबूत न मिलने की बात भी सामने आई, जिससे जांच को लेकर और सवाल खड़े हो गए। अब हाईकोर्ट की निगरानी में बनने वाली नई SIT से उम्मीद की जा रही है कि वह मामले के उन पहलुओं की भी जांच करेगी, जिन्हें अब तक नजरअंदाज किए जाने के आरोप लगते रहे हैं। पूरे देश की नजर अब 25 जून को आने वाली एसआईटी रिपोर्ट पर टिकी हुई है।
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