इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ का सख्त रुख : नेग के नाम पर वसूली अवैध, परंपरा के नाम पर नहीं मिलेगी मान्यता

लखनऊ|29 अप्रैल 2026
नेग के नाम पर वसूली अवैध, परंपरा के नाम पर नहीं मिलेगी मान्यता

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक अहम और स्पष्ट संदेश देने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने किन्नर समुदाय द्वारा बधाई या नेग के नाम पर की जाने वाली जबरन वसूली को अवैध करार दिया है। न्यायालय ने साफ कहा कि किसी भी प्रकार की ऐसी वसूली को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। अगर कोई व्यक्ति बिना विधिक आधार के धन मांगता या वसूलता है, तो यह सीधे तौर पर अपराध की श्रेणी में आता है। कोर्ट का यह फैसला सामाजिक व्यवस्था और कानून के दायरे को स्पष्ट करने वाला माना जा रहा है।

यह आदेश न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने किन्नर रेखा देवी की याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। याचिका में गोंडा जिले के कुछ इलाकों को नेग वसूली के लिए आरक्षित घोषित करने की मांग की गई थी। याची का कहना था कि वह लंबे समय से इन क्षेत्रों में नेग मांगती आ रही हैं। लेकिन अब अन्य किन्नरों के आने से विवाद और टकराव की स्थिति बन रही है। याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि ‘जजमानी परंपरा’ के तहत यह एक तरह का पारंपरिक अधिकार बन चुका है। इसलिए न्यायालय को इसमें हस्तक्षेप कर क्षेत्र का सीमांकन करना चाहिए ताकि भविष्य में विवाद न हो। याची ने इसे अपनी आजीविका से जुड़ा मुद्दा भी बताया और संरक्षण की मांग की।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

खंडपीठ ने याची के सभी तर्कों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी भी परंपरा के नाम पर अवैध गतिविधि को वैध नहीं बनाया जा सकता। यदि इस तरह की मांग को स्वीकार कर लिया जाए, तो यह कानून व्यवस्था के खिलाफ एक गलत उदाहरण स्थापित करेगा। अदालत ने यह भी कहा कि समाज में कई परंपराएं रही हैं, लेकिन हर परंपरा को कानूनी अधिकार नहीं माना जा सकता।कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बिना कानूनी प्रावधान के धन वसूलना, चाहे वह किसी भी नाम से हो, अपराध ही माना जाएगा। इसे किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

ट्रांसजेंडर कानून पर भी स्पष्टता

न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों से जुड़े कानूनों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा कानूनों में कहीं भी नेग या बधाई के नाम पर वसूली को अधिकार के रूप में मान्यता नहीं दी गई है। इसलिए इसे मौलिक या वैधानिक अधिकार बताना पूरी तरह गलत है।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों की रक्षा जरूरी है, लेकिन इसके लिए वैध और सम्मानजनक साधनों को ही अपनाया जाना चाहिए। किसी भी प्रकार की जबरन वसूली न तो समाज के लिए सही है और न ही कानून के दायरे में स्वीकार्य है।

फैसले के व्यापक मायने

यह फैसला केवल एक याचिका तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे समाज के कई पहलुओं पर असर पड़ेगा। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि परंपरा या सामाजिक प्रथा के नाम पर किसी भी तरह की अवैध वसूली को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा। इससे भविष्य में ऐसे मामलों पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है। साथ ही, यह निर्णय प्रशासन और पुलिस के लिए भी एक स्पष्ट दिशा-निर्देश है कि वे इस तरह की गतिविधियों पर सख्ती से कार्रवाई करें। वहीं, यह फैसला ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए भी एक संकेत है कि उन्हें अपने अधिकारों के लिए कानूनी और सम्मानजनक रास्तों को अपनाना होगा।

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