इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: गंभीर अपराध भी नहीं बनेगा किशोर की जमानत में बाधा, किशोर न्याय अधिनियम की धारा 12 का हवाला

प्रयागराज|8 घंटे पहले
गंभीर अपराध भी नहीं बनेगा किशोर की जमानत में बाधा, किशोर न्याय अधिनियम की धारा 12 का हवाला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किशोर न्याय से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर किसी नाबालिग की जमानत याचिका खारिज नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि हर मामले में किशोर की भूमिका, परिस्थितियों और उसके सामाजिक परिवेश का मूल्यांकन आवश्यक है। इस टिप्पणी को किशोर न्याय व्यवस्था में एक संवेदनशील और संतुलित दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है। न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने फिरोजाबाद से जुड़े एक मामले में निचली अदालतों के आदेश को निरस्त करते हुए आरोपित किशोर को सशर्त जमानत प्रदान कर दी।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने किशोर न्याय अधिनियम की धारा 12 का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी नाबालिग को जमानत देने से केवल तीन विशेष परिस्थितियों में ही इनकार किया जा सकता है। अदालत के अनुसार यदि किशोर की रिहाई से उसके अपराधियों के संपर्क में आने की आशंका हो, वह किसी नैतिक अथवा मानसिक खतरे में पड़ सकता हो या फिर उसकी रिहाई न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हो, तभी जमानत रोकी जा सकती है। इसके अतिरिक्त केवल आरोप की गंभीरता को आधार बनाकर जमानत याचिका अस्वीकार करना कानून की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

निचली अदालतों ने खारिज की थी जमानत

इस मामले में पहले किशोर न्याय बोर्ड और बाद में विशेष अदालत (पॉक्सो एक्ट) ने आरोपित किशोर की जमानत अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद आरोपी पक्ष की ओर से हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल की गई। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष जिला प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट भी प्रस्तुत की गई, जिसमें किशोर के खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं पाई गई। अदालत ने यह भी माना कि आरोपी किशोर का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और वह जनवरी 2025 से बाल सुधार गृह में निरुद्ध है।

अदालत ने लगाईं सख्त शर्तें

हाईकोर्ट ने किशोर को 20 हजार रुपये के निजी मुचलके और दो प्रतिभूतियों पर रिहा करने का आदेश दिया। इसके साथ अदालत ने कई महत्वपूर्ण शर्तें भी लगाईं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आरोपित किसी भी गवाह को प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेगा और न ही किसी प्रकार की गैरकानूनी गतिविधि में शामिल होगा। अदालत ने अभिभावकों को भी निर्देश दिया कि वे किशोर की गतिविधियों पर निगरानी रखें और उसके पुनर्वास तथा सामाजिक सुधार की दिशा में सहयोग करें। लीगल एक्सपर्ट्स का मानना है कि हाईकोर्ट का यह फैसला किशोर न्याय प्रणाली में सुधारात्मक दृष्टिकोण को मजबूत करेगा। साथ ही यह निर्णय उन मामलों में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां गंभीर धाराओं के बावजूद किशोरों के अधिकारों और पुनर्वास को प्राथमिकता देने की आवश्यकता होती है।

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