हाईकोर्ट का अहम फैसला: मामूली गलती पर आवेदन निरस्त करना गलत, 16 मई को होने वाले एग्जाम की दी अनुमति

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भर्ती परीक्षाओं को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि छोटी मानवीय गलतियों पर आवेदन निरस्त करना उचित नहीं है। जानबूझकर दी गई गलत जानकारी और तकनीकी भूल में बड़ा अंतर होता है। चयन एजेंसियों को ऐसे मामलों में व्यावहारिक और न्यायसंगत रवैया अपनाना चाहिए।
न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने यह आदेश दिया। अदालत ने याची शिवांगी उपाध्याय को राहत प्रदान की। कोर्ट ने उन्हें 16 मई को होने वाली परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दे दी। अदालत ने कहा कि यदि याची को परीक्षा से रोका गया, तब उसे अपूरणीय क्षति होगी।
क्या था पूरा मामला
मामला सहायक अध्यापक एलटी ग्रेड भर्ती परीक्षा से जुड़ा था। याची शिवांगी उपाध्याय ने ऑनलाइन आवेदन किया था। आवेदन भरते समय जेंडर कॉलम में गलती हो गई। महिला अभ्यर्थी होने के बावजूद पुरुष विकल्प भर दिया गया। हालांकि आवेदन में उनका फोटो भी अपलोड था। इससे पहचान स्पष्ट हो रही थी। बाद में याची को अपनी गलती का पता चला। इसके बाद उन्होंने सुधार के लिए आवेदन दिया। लेकिन विभाग ने उनका फॉर्म निरस्त कर दिया। विभाग का कहना था कि सुधार की निर्धारित अवधि समाप्त हो चुकी थी। इसलिए आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट ने अधिकारियों के रवैये पर टिप्पणी की
सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष ने विभागीय नियमों का हवाला दिया। सरकारी वकील ने कहा कि समयसीमा समाप्त होने के बाद सुधार संभव नहीं था। इसलिए विभाग ने नियमानुसार कार्रवाई की। लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि अधिकारियों को विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। यदि गलती स्पष्ट रूप से मानवीय भूल हो, तब सुधार का अवसर देना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि तकनीकी कारणों से योग्य अभ्यर्थियों का भविष्य प्रभावित नहीं होना चाहिए। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि लिपिकीय त्रुटियां सामान्य मानवीय भूल होती हैं। इन्हें धोखाधड़ी या गलत मंशा के बराबर नहीं माना जा सकता। यदि अभ्यर्थी की योग्यता पर कोई सवाल नहीं है, तब मामूली त्रुटि आवेदन निरस्त करने का आधार नहीं बन सकती।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी उल्लेख किया। अदालत ने वशिष्ठ नारायण कुमार बनाम बिहार राज्य मामले का हवाला दिया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन आवेदन की छोटी गलतियों पर टिप्पणी की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनजाने में हुई छोटी गलतियों को गंभीर अपराध नहीं माना जा सकता। यदि अभ्यर्थी अन्य सभी मानकों पर योग्य है, तब आवेदन रद्द करना उचित नहीं होगा। हाईकोर्ट ने इसी सिद्धांत को वर्तमान मामले में लागू किया।
परीक्षा में शामिल होने की मिली अनुमति
हाईकोर्ट ने कहा कि याची की गलती तकनीकी और अनजाने में हुई थी। आवेदन में फोटो और अन्य जानकारी सही मौजूद थी। ऐसे में पहचान या पात्रता को लेकर कोई विवाद नहीं था। कोर्ट ने माना कि आवेदन निरस्त करना कठोर कदम था। इसी आधार पर अदालत ने याची को परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दी। कोर्ट ने कहा कि भर्ती एजेंसियों को संवेदनशील रवैया अपनाना चाहिए। चयन प्रक्रिया का उद्देश्य योग्य अभ्यर्थियों को अवसर देना होना चाहिए। मामूली तकनीकी भूल के कारण किसी का करियर प्रभावित नहीं होना चाहिए। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला भविष्य की भर्ती प्रक्रियाओं में अहम असर डालेगा। इससे अभ्यर्थियों को राहत मिलने की उम्मीद बढ़ी है।
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