एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास पर हाईकोर्ट सख्त: गृह सचिव और प्रमुख सचिव को तलब होने के दिए निर्देश, सरकार की कार्यशैली पर उठाए सवाल

प्रयागराज|8 घंटे पहले
गृह सचिव और प्रमुख सचिव को तलब होने के दिए निर्देश, सरकार की कार्यशैली पर उठाए सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एसिड हमले के पीड़ितों के पुनर्वास, मुआवजे और दीर्घकालिक सहायता व्यवस्था को लेकर प्रदेश सरकार के रवैये पर गंभीर नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि ऐसे जघन्य अपराधों के मामलों में केवल अपराधियों के खिलाफ केस चलाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पीड़ितों के सम्मानजनक पुनर्वास और सुरक्षित भविष्य की जिम्मेदारी भी राज्य सरकार की है। न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने इस मामले में प्रमुख सचिव (गृह) और प्रमुख सचिव (महिला एवं बाल कल्याण विभाग) को 25 मई को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है।

खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि एसिड हमले जैसे गंभीर अपराधों से पीड़ित लोगों के लिए प्रदेश स्तर पर कोई प्रभावी और व्यापक पुनर्वास नीति दिखाई नहीं देती। अदालत ने यह भी कहा कि मुआवजे की राशि तर्कसंगत और वास्तविक जरूरतों के अनुरूप होनी चाहिए। न्यायालय के अनुसार एसिड हमले के पीड़ित जीवनभर शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आर्थिक संघर्ष से गुजरते हैं, इसलिए उन्हें केवल एकमुश्त अनुग्रह राशि देकर छोड़ देना संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं माना जा सकता।

पीड़िता ने मांगा रोजगार और अतिरिक्त सहायता

मामले की सुनवाई एक महिला पीड़िता की याचिका पर हुई, जिसने सरकार से अतिरिक्त मुआवजा और किसी सरकारी संस्थान में रोजगार देने की मांग की है। याचिकाकर्ता का कहना था कि जब वह एसिड हमले की शिकार हुई थी तब उसकी उम्र केवल 24 वर्ष थी और राज्य सरकार ने उसे मात्र छह लाख रुपये का मुआवजा दिया। इसके बाद उसके पुनर्वास, इलाज और सामाजिक पुनर्स्थापन के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। पीड़िता के अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि जुलाई 2025 में उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को भी अभ्यावेदन दिया गया था, लेकिन अब तक उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया।

हलफनामे से संतुष्ट नहीं हुआ हाईकोर्ट

अदालत के निर्देश पर एडिशनल मुख्य सचिव (गृह) की ओर से हलफनामा दाखिल किया गया, लेकिन हाईकोर्ट ने उसे अपर्याप्त बताते हुए असंतोष व्यक्त किया। कोर्ट ने कहा कि हलफनामे में केवल विभागीय चर्चाओं का उल्लेख है, जबकि पीड़ितों के पुनर्वास और दीर्घकालिक सहायता के लिए कोई स्पष्ट कार्ययोजना प्रस्तुत नहीं की गई। अदालत ने इसे मामले की गंभीरता के अनुरूप नहीं माना।

संविधान के दायित्व की याद दिलाई

खंडपीठ ने संविधान की सातवीं अनुसूची और अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य का कर्तव्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं है। यदि किसी नागरिक का जीवन किसी जघन्य अपराध के कारण स्थायी रूप से प्रभावित होता है, तो सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पीड़ित को गरिमा के साथ जीवन जीने के लिए पर्याप्त सहायता और पुनर्वास उपलब्ध कराए। अदालत की इस सख्त टिप्पणी को एसिड अटैक पीड़ितों के अधिकारों और पुनर्वास नीति को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप माना जा रहा है।

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