किशोर न्याय कानून सर्वोपरि: हाईकोर्ट ने रद्द की केस कार्यवाही, नई प्रक्रिया अपनाने की दी छूट

प्रयागराज|15 मई 2026
हाईकोर्ट ने रद्द की केस कार्यवाही, नई प्रक्रिया अपनाने की दी छूट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किशोर न्याय कानून को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट सामान्य आपराधिक कानूनों से ऊपर है। यदि आरोपित घटना के समय किशोर हो, तब विशेष प्रक्रिया अपनाना जरूरी होगा। ऐसे मामलों में सामान्य एफआईआर दर्ज करना कानून के खिलाफ माना जाएगा।

न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकलपीठ ने यह फैसला सुनाया। मामला औरैया के दो किशोरों से जुड़ा हुआ था। अदालत ने दोनों किशोरों के खिलाफ दाखिल चार्जशीट रद्द कर दी। कोर्ट ने संज्ञान आदेश और समन आदेश भी निरस्त कर दिए। इसके साथ किशोर न्याय बोर्ड में लंबित पूरी कार्यवाही खत्म कर दी गई। हालांकि अदालत ने कानून के मुताबिक नई प्रक्रिया अपनाने की छूट दी है।

क्या था पूरा मामला?

मामले में आरोप लगाया गया था कि दोनों किशोरों ने मारपीट की थी। उन पर धन मांगने और धमकी देने के आरोप भी लगाए गए थे। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने नियमित एफआईआर दर्ज कर ली थी। बाद में जांच के दौरान दोनों आरोपितों की उम्र 18 साल से कम पाई गई। इसके बावजूद पुलिस ने सामान्य आपराधिक प्रक्रिया जारी रखी। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने चार्जशीट भी दाखिल कर दी। मामला किशोर न्याय बोर्ड तक पहुंच गया था। इसके खिलाफ दोनों किशोरों की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई। याचिका में पुलिस कार्रवाई को कानून के खिलाफ बताया गया।

अधिवक्ता ने कोर्ट में रखी अहम दलील

याची पक्ष की ओर से अधिवक्ता पंकज कुमार गुप्ता ने अदालत में विस्तार से पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस मॉडल रूल्स, 2016 में स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं। नियम 8 के अनुसार जघन्य अपराधों को छोड़कर सामान्य एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती। अधिवक्ता ने दलील दी कि ऐसे मामलों में केवल जनरल डायरी में सूचना दर्ज होगी। इसके बाद सोशल बैकग्राउंड रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। उन्होंने कहा कि पुलिस ने विशेष कानून को नजरअंदाज किया। इसलिए पूरी कार्रवाई अवैध मानी जानी चाहिए।

हाईकोर्ट ने कानून की व्याख्या की

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 1(4) का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि यह अधिनियम विशेष कानून के रूप में लागू होता है। जब विशेष कानून मौजूद हो, तब सामान्य प्रक्रिया लागू नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि पुलिस को किशोर मामलों में अलग प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट सुधारात्मक कानून है। इसका उद्देश्य बच्चों को दंडित करना नहीं है। कानून का मकसद किशोरों का सुधार और पुनर्वास सुनिश्चित करना है। इसलिए हर मामले में बाल हित सर्वोपरि रहेगा। कोर्ट ने कहा कि किशोर मामलों में संवेदनशील प्रक्रिया जरूरी है। पुलिस और प्रशासन को कानूनी प्रावधानों का पालन करना होगा। यदि ऐसा नहीं किया गया, तब कार्यवाही न्यायिक जांच में टिक नहीं सकेगी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का भी जिक्र किया। अदालत ने कहा कि यदि किसी कार्रवाई पर स्पष्ट कानूनी रोक हो, तब उच्च न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है। ऐसी स्थिति में पूरी कार्यवाही निरस्त करना न्यायिक अधिकार के दायरे में आता है। कोर्ट ने माना कि वर्तमान मामले में भी यही स्थिति बनी थी। पुलिस ने किशोर न्याय कानून की अनदेखी की थी। इसी कारण अदालत ने चार्जशीट से लेकर समन आदेश तक रद्द कर दिए। फैसले को किशोर न्याय प्रणाली के लिए अहम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय भविष्य के मामलों में मिसाल बनेगा।

नव्य जागरण

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