सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: उच्च योग्यता छिपाकर नौकरी पाना अस्वीकार्य, सार्वजनिक रोजगार में पारदर्शिता जरूरी

सार्वजनिक रोजगार में पारदर्शिता और समान अवसर के सिद्धांत को मजबूत करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि कम शैक्षणिक योग्यता के लिए निर्धारित पदों पर अधिक योग्यता रखने वाले उम्मीदवार यदि अपनी वास्तविक शैक्षणिक योग्यता छिपाकर नौकरी हासिल करते हैं तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि उस पद के वास्तविक हकदार उम्मीदवारों के अधिकारों का भी हनन है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी नियुक्तियां कानून की दृष्टि में वैध नहीं मानी जा सकतीं। इन्हें न्यायसंगत ठहराना सार्वजनिक रोजगार प्रणाली की मूल भावना के विपरीत होगा।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया। जिसमें एक व्यक्ति को राहत दी गई थी। संबंधित व्यक्ति ने सिंडिकेट बैंक में अटेंडेंट के पद पर नियुक्ति प्राप्त करने के लिए अपनी स्नातक डिग्री की जानकारी छिपाई थी। हाई कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को रद्द करते हुए कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया में तथ्यों को छिपाना गंभीर अनियमितता है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
कम शिक्षित अभ्यर्थियों के अवसरों की रक्षा जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कम योग्यता वाले पदों के लिए निर्धारित चयन प्रक्रिया का उद्देश्य उन अभ्यर्थियों को अवसर प्रदान करना है। जिनकी शैक्षणिक योग्यता सीमित है। यदि अधिक शिक्षित उम्मीदवार अपनी डिग्री छिपाकर ऐसे पदों पर नियुक्ति प्राप्त करने लगेंगे तो कम शिक्षित वर्ग के लोगों के रोजगार के अवसर प्रभावित होंगे। अदालत ने कहा कि सरकार द्वारा कुछ पदों को विशेष शैक्षणिक योग्यता तक सीमित रखना एक वैध और तार्किक नीति है। जिससे विभिन्न वर्गों के अभ्यर्थियों को रोजगार के अवसर मिल सकें।
सार्वजनिक रोजगार में नियमों का पालन अनिवार्य
पीठ ने अपने पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में नियुक्ति निर्धारित पात्रता और नियमों के अनुरूप ही होनी चाहिए। केवल इसलिए कि कोई उम्मीदवार अधिक योग्य है। उसे कम योग्यता वाले पद पर नियुक्ति पाने का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत ने कहा कि चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए पात्रता मानकों का सख्ती से पालन किया जाना आवश्यक है।
शिक्षा और भर्ती से जुड़े मामलों में सक्रिय है सुप्रीम कोर्ट
हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट शिक्षा और भर्ती से जुड़े विभिन्न मामलों में महत्वपूर्ण फैसले दे रहा है। हाल ही में कोर्ट ने सीबीएसई की नौवीं कक्षा में लागू तीन-भाषा नीति की व्यवहारिकता और उसके प्रभाव की समीक्षा करने की बात कही थी। इसके अलावा शीर्ष कोर्ट ने शिक्षकों के लिए टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (टीईटी) उत्तीर्ण करना अनिवार्य बताते हुए समयसीमा 31 अगस्त 2028 तक बढ़ाई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए योग्य शिक्षकों की नियुक्ति और सेवा में बने रहने के लिए निर्धारित मानकों का पालन आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले को सार्वजनिक रोजगार में पारदर्शिता, निष्पक्षता और अवसरों की समानता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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