सबरीमाला केस पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी : ‘हर धार्मिक प्रथा को अदालत में चुनौती देना सही नहीं’, समाज की संरचना भी होगी प्रभावित

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने सबरीमाला और दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान धर्म और धार्मिक परंपराओं को लेकर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि अगर हर धार्मिक प्रथा और रिवाज को अदालत में चुनौती दी जाने लगी, तो इससे सिर्फ धार्मिक व्यवस्था ही नहीं बल्कि समाज की संरचना भी प्रभावित होगी। अदालत ने चिंता जताई कि ऐसी स्थिति में सैकड़ों याचिकाएं दायर होंगी और हर परंपरा पर सवाल खड़े होने लगेंगे।
यह टिप्पणी नौ जजों की संविधान पीठ ने की। पीठ अलग-अलग धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार और धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है। इनमें सबरीमाला मंदिर से जुड़ा मामला और दाऊदी बोहरा समुदाय का बहुचर्चित केस शामिल है।
कोर्ट बोला- धर्म और समाज का संतुलन बिगड़ सकता है
सुनवाई के दौरान जस्टिस बी वी नागरत्ना ने कहा कि भारत में धर्म सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। यहां धर्म समाज और संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। अगर हर व्यक्ति धार्मिक परंपराओं को चुनौती देने लगेगा तो इसका असर पूरे समाज पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि भविष्य में मंदिर कब खुलेगा, कौन प्रवेश करेगा और कौन नहीं करेगा जैसे मामलों पर भी अदालतों में मुकदमे आने लगेंगे। इससे अदालतों पर बोझ बढ़ेगा और धार्मिक संस्थाओं के कामकाज पर भी असर पड़ेगा। जस्टिस एमएम सुन्द्रेश ने भी कहा कि अगर इस तरह के विवाद लगातार बढ़ते रहे तो हर व्यक्ति हर धार्मिक परंपरा पर सवाल उठाने लगेगा। इससे धर्मों की संरचना कमजोर पड़ सकती है।
धार्मिक आजादी बनाम मौलिक अधिकार पर बहस
सुनवाई के दौरान सुधारवादी दाऊदी बोहरा समूह की ओर से सीनियर वकील राजू रामचंद्रन ने कोर्ट में दलील दी कि हर धार्मिक प्रथा को संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षण नहीं मिल सकता। उन्होंने कहा कि अगर कोई परंपरा किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है या सामाजिक रूप से भेदभाव पैदा करती है, तो अदालत उसमें हस्तक्षेप कर सकती है। इसके जवाब में कोर्ट ने कहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता और धार्मिक परंपराओं में है। इसलिए धार्मिक मामलों में संतुलन बनाए रखना जरूरी है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि हर सामाजिक या धार्मिक विवाद को सीधे संवैधानिक चुनौती में बदलना सही नहीं माना जा सकता।
दाऊदी बोहरा समुदाय का पुराना विवाद फिर चर्चा में
यह मामला दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़ी 40 साल पुरानी जनहित याचिका से भी जुड़ा है। समुदाय के केंद्रीय बोर्ड ने 1986 में याचिका दाखिल कर 1962 के फैसले को चुनौती दी थी। उस फैसले में बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ एक्सकम्युनिकेशन एक्ट, 1949 को रद्द कर दिया गया था। इस कानून के तहत किसी सदस्य को धार्मिक समुदाय से बाहर करना गैरकानूनी माना गया था। लेकिन 1962 में अदालत ने कहा था कि किसी सदस्य को समुदाय से अलग करना धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों का हिस्सा हो सकता है। इसे संविधान के अनुच्छेद 26(बी) के तहत संरक्षण प्राप्त है। अब इसी मुद्दे पर फिर से संविधान पीठ सुनवाई कर रही है। अदालत यह तय करेगी कि धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों और व्यक्तिगत मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
सबरीमाला केस भी बहस के केंद्र में
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा भी इस सुनवाई का अहम हिस्सा बना हुआ है। केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि कई धार्मिक स्थलों पर परंपराओं के आधार पर कुछ प्रतिबंध पहले से लागू हैं। सरकार ने दलील दी कि धार्मिक परंपराओं और आस्था का सम्मान किया जाना चाहिए। इस मामले पर सात अप्रैल से लगातार सुनवाई चल रही है। संविधान पीठ अब उन सात बड़े सवालों पर विचार कर रही है जो धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार और धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता से जुड़े हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने वाले समय में देश के कई धार्मिक मामलों की दिशा तय कर सकता है।
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