राजनीतिक प्रभाव से प्रभावित होती है प्रशासनिक निष्पक्षता: निर्दोष महिला के 80 दिन जेल में रहने पर हाईकोर्ट ने जताई चिंता, गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई की रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि प्रदेश में तबादला, पोस्टिंग और पदोन्नति की प्रक्रिया लंबे समय से राजनीतिक प्रभाव से प्रभावित रही है। इसका सीधा असर अधिकारियों के कामकाज और प्रशासनिक निष्पक्षता पर पड़ता है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने यह टिप्पणी गाजियाबाद के एक भूमि विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने पाया कि पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में एक महिला को गैंगस्टर एक्ट के तहत आरोपी बनाकर जेल भेज दिया गया। जिसके कारण उसे लगभग 80 दिन तक कारावास में रहना पड़ा।
अपने फैसले में अदालत ने कहा कि कई बार अधिकारियों की नियुक्ति और तैनाती उनकी योग्यता, क्षमता और कार्यकुशलता के बजाय राजनीतिक समीकरणों के आधार पर होती है। कोर्ट ने कहा कि फील्ड में कार्यरत अधिकारी स्थानांतरण और पदस्थापन की प्रक्रिया को भलीभांति समझते हैं। इसलिए कई बार उनका व्यवहार संविधान और कानून के प्रति जवाबदेही के बजाय राजनीतिक नेतृत्व को संतुष्ट करने की दिशा में प्रभावित होता है। कोर्ट ने इसे प्रशासनिक निष्पक्षता और सुशासन के लिए चिंताजनक बताया।
भूमि विवाद से शुरू हुआ पूरा मामला
मामला गाजियाबाद निवासी राजेंद्र त्यागी और उनके परिवार से जुड़ा है। उनके खिलाफ पहले भूमि विवाद को लेकर धोखाधड़ी, जालसाजी और अन्य धाराओं में केस दर्ज किया गया था। बाद में पुलिस ने मामले को संगठित अपराध से जोड़ते हुए गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई शुरू कर दी। पुलिस का दावा था कि आरोपी एक गिरोह के रूप में कार्य कर रहे थे। इसी आधार पर गैंग चार्ट तैयार किया गया। परिवार के कई सदस्यों को आरोपी बनाया गया। इनमें ललिता त्यागी का नाम भी शामिल था। जिन्हें अरेस्ट कर जेल भेज दिया गया।
गैंगस्टर एक्ट लगाने के पर्याप्त आधार नहीं मिले
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े दस्तावेजों और साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण किया। अदालत को ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला। जिससे यह साबित हो सके कि ललिता त्यागी किसी संगठित आपराधिक गिरोह का हिस्सा थीं या उन्होंने अवैध तरीके से आर्थिक लाभ प्राप्त किया था। अदालत ने कहा कि किसी सामान्य भूमि विवाद को गैंगस्टर एक्ट जैसे कठोर कानून के दायरे में लाने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय आधार होना आवश्यक है। केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को गैंगस्टर घोषित नहीं किया जा सकता।
पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर भी उठाए सवाल
कोर्ट ने यह भी कहा कि गैंग चार्ट को मंजूरी देते समय संबंधित अधिकारियों को स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से तथ्यों की जांच करनी चाहिए। फैसले में तत्कालीन गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर अजय मिश्रा की भूमिका का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि मामले में अपेक्षित सावधानी नहीं बरती गई। न्यायालय ने अधिकारियों को भविष्य में ऐसे मामलों में अधिक संतुलन, जिम्मेदारी और कानूनी सतर्कता के साथ निर्णय लेने की सलाह दी।
निष्पक्षता पर दिया जोर
हाईकोर्ट ने राजेंद्र त्यागी और उनके परिवार के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत की गई पूरी कार्रवाई को निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य लोगों को न्याय दिलाना है, न कि बिना पर्याप्त आधार के कठोर दंडात्मक कार्रवाई करना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस और प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी संविधान तथा विधि के शासन के अनुरूप कार्य करना है। प्रत्येक अधिकारी को अपने अधिकारों का प्रयोग निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ करना चाहिए। जिससे आम नागरिकों का न्याय व्यवस्था और प्रशासन पर विश्वास बना रहे।
अधूरा नहीं! पूरी खबर पढ़ें नव्य जागरण ऐप पर
ताजा खबरें, लोकल अपडेट और ब्रेकिंग अलर्ट सीधे अपने मोबाइल पर पाएं।







