गोरखपुर आवास विकास की बढ़ी मुश्किलें: 11 मकानों पर संकट, हाईकोर्ट जाएंगे आवंटी

शहर के पॉश इलाके बेतियाहाता में आवास विकास परिषद की लापरवाही अब बड़े विवाद का रूप लेती जा रही है। वर्षों पहले परिषद द्वारा आवंटित किए गए मकानों और भूखंडों पर अब संकट के बादल मंडरा रहे हैं। स्थानीय अदालत के आदेश के बाद जिन भवनों को खाली कराने की प्रक्रिया शुरू हुई है। उसमें अब आवंटी भी खुलकर सामने आ गए हैं। पूर्व विधायक, चिकित्सक और बड़े व्यवसायियों समेत 11 आवंटी अब आवास विकास परिषद के खिलाफ हाईकोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं। इसके साथ ही सीएम योगी से मुलाकात कर विभाग की कथित मनमानी और लापरवाही की शिकायत करने की भी योजना बनाई जा रही है।
मंगलवार को कोर्ट अमीन विवादित भूमि पर कब्जा दिलाने पहुंचे थे। इस दौरान मकानों की पैमाइश कर कई भवनों पर निशान भी लगाए गए है। इसके बाद क्षेत्र में हड़कंप मच गया। बुधवार को प्रभावित आवंटियों ने अपने आवंटन से जुड़े दस्तावेजों और रजिस्ट्री के कागजात जुटाने शुरू कर दिए। आवंटियों का कहना है कि उन्होंने सरकारी संस्था पर भरोसा करके वैध प्रक्रिया के तहत भूखंड और मकान खरीदे थे, ऐसे में अब उनके मकानों को ध्वस्त करना अन्यायपूर्ण होगा।
55 डिसमिल जमीन बना विवाद की जड़
पूरा मामला खुर्रमपुर (बेतियाहाता) स्थित उस जमीन से जुड़ा है, जिसे आवासीय कॉलोनी विकसित करने के लिए 1980 के दशक में अधिग्रहित किया गया था। जानकारी के अनुसार, जमीन मालिक श्याम सुंदर सराफ की कुल दो एकड़ 55 डिसमिल भूमि में से परिषद ने केवल दो एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया और उसी का मुआवजा दिया है। आरोप है कि अतिरिक्त 55 डिसमिल जमीन का न तो अधिग्रहण किया गया और न ही उसका भुगतान हुआ है। परिषद ने उस हिस्से पर भी भवन और भूखंड बनाकर लोगों को आवंटित कर दिया है। इसी को लेकर श्याम सुंदर सराफ ने वर्ष 1993 में अदालत का दरवाजा खटखटाया था। वर्ष 1999 में सिविल जज सीनियर डिवीजन ने आदेश दिया कि तीन महीने के भीतर अवैध कब्जा हटाकर जमीन वास्तविक मालिक को सौंपी जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि विवादित जमीन किसी अन्य को हस्तांतरित नहीं की जाएगी। बावजूद इसके परिषद ने बाद के वर्षों में भवनों को फ्री होल्ड तक कर दिया।
कोर्ट अमीन पहुंचे तो मचा हंगामा
हाल ही में कोर्ट के आदेश के अनुपालन में कोर्ट अमीन वीरेंद्र यादव टीम और जेसीबी के साथ मौके पर पहुंचे। जैसे ही मकानों पर निशान लगाए जाने लगे, आवंटियों ने विरोध शुरू कर दिया। स्थिति को देखते हुए जेसीबी का इस्तेमाल नहीं किया गया, क्योंकि इससे पूरे भवनों को नुकसान पहुंचने की आशंका थी। फिलहाल कब्जा दिलाने की प्रक्रिया अधूरी है, लेकिन विवाद और गहरा गया है। आवंटी डॉ. राजीव जायसवाल ने कहा कि उन्होंने वर्षों पहले आवास विकास परिषद से विधिवत मकान खरीदा था और तब किसी विवाद की जानकारी नहीं दी गई। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकारी संस्था ने ही आवंटन किया था, तो अब आम नागरिकों को इसकी सजा क्यों दी जा रही है।
मुख्यमंत्री से मिलेंगे आवंटी
प्रभावित लोगों का कहना है कि आवास विकास परिषद अब जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहा है। आवंटियों के मुताबिक, सरकारी संस्था होने के कारण परिषद पर भरोसा किया गया था। अब जब कोर्ट का आदेश आया है तो विभाग के अधिकारी मामले से दूरी बना रहे हैं। आवंटी परिषद को ही पक्षकार बनाकर हाईकोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं। स्थानीय पार्षद विश्वजीत त्रिपाठी ने भी परिषद की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले में न जमीन मालिक दोषी है और न ही आवंटी, बल्कि पूरी जिम्मेदारी आवास विकास परिषद की है। उन्होंने कहा कि विभाग को आगे आकर समाधान निकालना चाहिए, ताकि वर्षों से रह रहे लोगों के सिर से छत न छिने।
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