विकास की 'चमक' या कंक्रीट की 'धधकती भट्टी': गोरखपुर की गर्मी ऐसी कि झुलस जाए आम आदमी, चौड़ी सड़कों के किनारे खोजे नहीं मिलते शेड और वाटर कूलर

गोरखपुर|10 घंटे पहले
गोरखपुर की गर्मी ऐसी कि झुलस जाए आम आदमी, चौड़ी सड़कों के किनारे खोजे नहीं मिलते शेड और वाटर कूलर

गोरखपुर की नई और चमचमाती सड़कों पर कदम रखते ही आपको किसी यूरोपीय शहर का भ्रम हो सकता है। चौड़ी सड़कें, आधुनिक लाइटें और विकास की एक ऐसी रफ्तार जो आंखों को चौंधिया देती है। लेकिन, जैसे ही मई-जून की तपती-चुभती धूप इस कंक्रीट के जंगल पर बरसती है, विकास का यह 'यूरोपीय भ्रम' पल भर में टूट जाता है। करोड़ों के बजट से बनी इन सड़कों पर योजनाकार यह भूल गए कि इस विकास को निहारने वाली जनता हाड़-मांस की है, जिसे कड़कड़ाती धूप से बचने के लिए दो मिनट की छांव और एक शेड की जरूरत भी होती है। इन बेसिक सुविधाओं के अभाव में गोरखपुर का विकास उस 'अंधेरे कोने' जैसा नजर आता है, जहां मानवीयता पूरी तरह से गुम हो गई हो।

यूरोपीय लुक का भ्रम और कंक्रीट का टापू

पूर्वांचल का दिल गोरखपुर आज तेजी से बदल रहा है। रामगढ़ताल का मरीन ड्राइव हो या शहर की चौड़ी फोर-लेन सड़कें, इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में शहर वाकई तेजी से आगे बढ़ा है। सौंदर्यीकरण के नाम पर डिवाइडरों को सजाया गया है और आधुनिक कलाकृतियां लगाई गई हैं। लेकिन इस 'आधुनिकता' की दौड़ में शहर के पारंपरिक मिजाज और राहगीरों की बुनियादी जरूरतों को हाशिए पर डाल दिया गया है। चौड़ीकरण के नाम पर दशकों पुराने छायादार पेड़ों को काट दिया गया, जिससे सड़कें अब 'कंक्रीट की धधकती भट्ठियों' में तब्दील हो चुकी हैं।

विकास मॉडल में प्लानिंग की चूक

गोरखपुर के इस नए विकास मॉडल में सबसे बड़ी चूक इसकी प्लानिंग में दिखती है। शहर के मुख्य चौराहों या सड़कों के किनारे पैदल चलने वाले राहगीरों, ठेला खींचने वाले मजदूरों, महिलाओं और बुजुर्गों के लिए सिर छिपाने की कोई जगह नहीं है। शहर के ई-रिक्शा चालक बॉबी ने कहा, साहब! गरीब का कौन ध्यान रखता है, जब 45 डिग्री तापमान में लोहे का यह ई-रिक्शा चलाते हैं तो लगता है, जैसे किसी तंदूर में बैठ गए हैं । यह सोच के मन व्यथित हो जाता कि हमारे शहर में सिर छिपाने को कोई ऐसा स्थान नहीं जहां दो पल राहत से बैठ सकें।

शेड्स का अकाल

शहर की सड़कों पर लगे यातायात सिग्नलों या प्रमुख बस स्टॉप्स के पास ऐसे कवर्ड शेड्स का पूरी तरह अभाव है, जहां कोई व्यक्ति धूप या अचानक आई बारिश से दो मिनट राहत पा सके।

स्मार्ट सिटी का अधूरा सच

एक तरफ शहर को 'स्मार्ट' बनाने का दावा है, वहीं दूसरी तरफ राहगीर चौराहों पर लाल बत्ती होने पर दोपहिया वाहनों को किसी होर्डिंग या बिजली के खंभे की पतली सी परछाई में खड़ा करने को मजबूर हैं।

इंसानों के ठहरने लायक नहीं

योजनाकारों ने शहर को गाड़ियों के चलने लायक तो बना दिया, लेकिन इंसानों के ठहरने लायक नहीं छोड़ा। जब तापमान 42 से 45 डिग्री सेल्सियस के बीच आग बरसा रहा हो, तब पानी पीने का कोई सार्वजनिक प्याऊ या सुस्ताने के लिए एक अदद बेंच न मिलना विकास के इस क्रूर चेहरे को उजागर करता है। बुजुर्ग और महिलाएं धूप के कारण सड़कों पर गश खाकर गिरने की स्थिति में आ जाते हैं, लेकिन कंक्रीट के इस नए 'यूरोपीय' ढांचे में उनके लिए कोई जगह नहीं है।

नव्य जागरण

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