जियाउल हक केस में CBI की क्लोजर रिपोर्ट मंजूर: राजा भैया समेत 5 आरोपियों को बड़ी राहत, दस दोषियों को पहले ही मिल चुकी सजा

जियाउल हक हत्याकांड से जुड़े मामले में लखनऊ की विशेष CBI अदालत ने दोबारा जांच के बाद दाखिल क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली है। 19 सितंबर 2026 को विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट CBI प्रतिभा सिंह की अदालत के इस आदेश के बाद राजा भैया समेत पांच लोगों के खिलाफ इस मामले में आगे अदालती कार्रवाई नहीं होगी। आदेश की जानकारी मिलने के बाद जियाउल हक के पिता हाजी शमसुल हक भावुक हो गए। खुखुंदू के जुआफर गांव निवासी शमसुल हक ने कहा कि बेटे को खोने के बाद उन्हें न्याय की उम्मीद थी, लेकिन अदालत के इस आदेश से उन्हें गहरा आघात पहुंचा है।
हाजी शमसुल हक ने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं थी, फिर भी उन्होंने जियाउल हक की पढ़ाई जारी रखी। गांव के स्कूल से पढ़ाने के बाद प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए उन्हें प्रयागराज भेजा। मेहनत के बाद जियाउल हक पुलिस अधिकारी बने तो परिवार को लगा कि परिस्थितियां बदलेंगी। वर्ष 2012 में उन्हें कुंडा सर्किल का सीओ बनाया गया, लेकिन करीब एक साल बाद ही उनकी हत्या हो गई। पिता के मुताबिक, बेटे की मौत ने परिवार को पूरी तरह तोड़ दिया और इसके बाद से वह न्याय की उम्मीद लगाए हुए हैं।
प्रधान की हत्या के बाद मौके पर पहुंचे थे CO
दो मार्च 2013 को प्रतापगढ़ के बलीपुर गांव में प्रधान नन्हे यादव की हत्या के बाद सीओ जियाउल हक मौके पर पहुंचे थे। वहां मौजूद भीड़ ने उन्हें घेर लिया और उनकी हत्या कर दी। घटना के बाद जांच CBI को सौंपी गई। जांच के आधार पर मुकदमा चला और अक्टूबर 2024 में CBI की विशेष अदालत ने 10 आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। दोषियों में फूलचंद यादव, पवन यादव और मंजीत यादव समेत 10 लोग शामिल थे।
पहले भी दाखिल की था रिपोर्ट
जियाउल हक की पत्नी डॉ. परवीन आजाद की शिकायत के आधार पर राजा भैया समेत कुछ लोगों के खिलाफ भी जांच की गई थी। CBI ने इस मामले में पहले भी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी। बाद में दोबारा जांच के बाद राजा भैया समेत पांच लोगों के खिलाफ फिर क्लोजर रिपोर्ट अदालत में पेश की गई। कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही इन पांचों के खिलाफ इस मामले में आगे की अदालती कार्रवाई का रास्ता बंद हो गया।
बेटे के लिए न्याय की आस लगाए
शमसुल हक के मुताबिक, जियाउल हक की मौत के बाद उनकी बहू डॉ. परवीन आजाद का गांव आना-जाना कम हो गया। समय के साथ ससुराल पक्ष से रिश्तों में भी दूरी बढ़ती गई। उन्होंने बताया कि एलआईसी के पैसों को लेकर मुकदमा हुआ था। अब चल-अचल संपत्ति को लेकर भी मामला चल रहा है, जिसकी सुनवाई 28 सितंबर को होनी है। शमसुल हक ने कहा कि बेटे की मौत का दर्द तो जीवनभर रहेगा, लेकिन वह न्याय की उम्मीद नहीं छोड़ना चाहते। उनके अनुसार, वह और उनकी पत्नी हाजरा खातून अब भी बेटे के लिए न्याय की आस लगाए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि मुकदमों के सिलसिले में बुढ़ापे में बार-बार जाना पड़ता है और बहू से बातचीत तक नहीं होती। उनके मुताबिक, परवीन आजाद सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा लड़ने की बात कह चुकी हैं।










