दो-तिहाई बहुमत के लक्ष्य पर एनडीए की नजर: नए सहयोगियों और रणनीतिक समर्थन की तलाश तेज, 41 अतिरिक्त सांसदों की जरूरत

3 घंटे पहले
नए सहयोगियों और रणनीतिक समर्थन की तलाश तेज, 41 अतिरिक्त सांसदों की जरूरत

लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के लक्ष्य के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने अपनी राजनीतिक रणनीति तेज कर दी है। संवैधानिक संशोधनों से जुड़े अहम विधेयकों को पारित कराने के लिए आवश्यक संख्या जुटाने की कवायद के तहत सहयोगी दलों के विस्तार, विपक्षी दलों में संभावित समर्थन और अन्य संसदीय विकल्पों पर मंथन किया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार भाजपा नेतृत्व का उद्देश्य केवल महिला आरक्षण और परिसीमन तक सीमित नहीं है। पार्टी ‘एक देश-एक चुनाव’, न्यायिक सुधार तथा अन्य संवैधानिक बदलावों जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी आगे बढ़ना चाहती है। इन सभी के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत आवश्यक है। बताया जा रहा है कि 17 अप्रैल को महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयक पर अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने के बाद पार्टी ने इस दिशा में अपनी रणनीति और तेज कर दी।

दो विकल्पों पर चल रहा राजनीतिक मंथन

मौजूदा संसदीय गणित के अनुसार एनडीए को दो-तिहाई बहुमत तक पहुंचने के लिए अभी 41 सांसदों के अतिरिक्त समर्थन की जरूरत है। इसके लिए पहला विकल्प विपक्षी सांसदों के समर्थन, दल बदल या नए राजनीतिक समीकरणों के जरिए संख्या बढ़ाने का माना जा रहा है। दूसरा विकल्प मतदान के दौरान विपक्षी सांसदों की गैरमौजूदगी के जरिए प्रभावी सदस्य संख्या कम करने का है। ऐसी स्थिति में आवश्यक बहुमत का आंकड़ा भी घट जाएगा। इसी रणनीति के तहत समाजवादी पार्टी, डीएमके, एनसीपी (शरद गुट) समेत अन्य दलों के सांसदों पर राजनीतिक नजर रखी जा रही है। साथ ही कुछ निर्दलीय और छोटे दलों के सांसद भी इस समीकरण का हिस्सा माने जा रहे हैं।

हालिया घटनाक्रम ने बढ़ाई चर्चाएं

हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों में तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों के अलग होकर एनडीए को समर्थन देने तथा शिवसेना (उद्धव गुट) के छह सांसदों के शिंदे गुट में शामिल होने की चर्चाओं ने इस रणनीति को लेकर अटकलें तेज कर दी हैं। हालांकि, इसके बावजूद गठबंधन को दो-तिहाई बहुमत के लिए अभी और सांसदों की आवश्यकता बनी हुई है। महाराष्ट्र भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने दावा किया कि एनसीपी (शरद गुट) के अधिकांश सांसद सरकार के रुख के प्रति सकारात्मक हैं, हालांकि सरकार का कहना है कि वह विभिन्न विधेयकों पर सभी दलों से संवाद बनाए हुए है।

परिसीमन और महिला आरक्षण को लेकर नई रणनीति

राजनीतिक और संवैधानिक मामलों के जानकारों का मानना है कि 2026 में प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया तथा उसके बाद महिला आरक्षण लागू करने के लिए संविधान संशोधन आवश्यक होगा। एक्सपर्ट्स के अनुसार यदि समय पर परिसीमन नहीं कराया जाता है तो इसके लिए भी संविधान में संशोधन करना पड़ सकता है। इसी वजह से महिला आरक्षण और परिसीमन को एक व्यापक संवैधानिक ढांचे के तहत आगे बढ़ाने की रणनीति तैयार की गई है। इसके साथ ही भविष्य में ‘एक देश-एक चुनाव’ और अन्य सुधारों के लिए भी पर्याप्त संसदीय समर्थन जुटाने की कोशिश जारी है।

मानसून सत्र पर टिकी निगाहें

सूत्रों के मुताबिक भाजपा का प्रयास है कि संसद के आगामी मानसून सत्र तक आवश्यक राजनीतिक समर्थन का आधार तैयार कर लिया जाए। आने वाले दिनों में विभिन्न दलों के साथ संवाद और संसदीय रणनीति इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकती है।

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