दिवाली से पहले चमका गोरखपुर का टेराकोटा कारोबार: देशभर से मिले ढाई करोड़ के ऑर्डर, 2,500 कारीगरों के घर जलेगी खुशहाली की रोशनी

महानगर का मशहूर टेराकोटा कारोबार इस बार दिवाली से पहले ही चमक उठा है। एक जिला-एक उत्पाद यानी ओडीओपी योजना में शामिल गोरखपुर की टेराकोटा कला को देशभर से जबरदस्त रिस्पॉन्स मिल रहा है। हैदराबाद, अहमदाबाद, मुंबई, दिल्ली, राजस्थान, सूरत और आंध्र प्रदेश समेत कई बड़े शहरों से अब तक करीब ढाई करोड़ रुपये के ऑर्डर मिल चुके हैं। लगातार बढ़ती मांग से कारीगरों के चेहरे खिल उठे हैं। मिट्टी से कला गढ़ने वाले शिल्पकार अब दिन-रात काम में जुट गए हैं ताकि समय पर सभी ऑर्डर पूरे किए जा सकें।
कारीगरों का कहना है कि इस बार दिवाली सीजन में कारोबार 10 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस बढ़ते कारोबार से करीब 2500 कारीगरों और उनके परिवारों को सीधा फायदा मिलेगा। गांवों और कारीगर बस्तियों में अभी से त्योहार जैसा माहौल दिखाई देने लगा है। हर घर में दीये, सजावटी आइटम, मिट्टी की मूर्तियां, हाथी, घोड़े और पारंपरिक डिजाइन वाले उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।
देश के बड़े शहरों से बढ़ी डिमांड
राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित टेराकोटा शिल्पकार राजन प्रजापति ने बताया कि इस बार बाजार की डिमांड पिछले वर्षों से कहीं ज्यादा मजबूत है। उन्होंने कहा कि अभी तक करीब 15 ट्रक उत्पादों के बड़े ऑर्डर मिल चुके हैं। इनमें हैदराबाद और अहमदाबाद से सबसे ज्यादा मांग आई है। दोनों शहरों से दो-दो ट्रक माल की बुकिंग हो चुकी है। कारीगरों के मुताबिक एक ट्रक में करीब 15 से 20 हजार टेराकोटा उत्पाद भेजे जाते हैं। एक ट्रक की कीमत लगभग पांच से छह लाख रुपये तक होती है। आने वाले महीनों में यह संख्या और तेजी से बढ़ सकती है। व्यापारियों का कहना है कि जैसे-जैसे दिवाली करीब आएगी, ऑर्डर और बढ़ेंगे।
छह महीने पहले शुरू हो जाता है काम
टेराकोटा शिल्पकारों के लिए दिवाली सबसे बड़ा सीजन माना जाता है। इसलिए कारीगर छह महीने पहले से ही तैयारी शुरू कर देते हैं। मिट्टी तैयार करने से लेकर डिजाइन बनाने, रंगाई और फिनिशिंग तक हर प्रक्रिया में काफी मेहनत लगती है। यही वजह है कि कारीगर समय रहते ऑर्डर तैयार करने में जुट जाते हैं। कारीगर विवेश प्रजापति ने बताया कि पूरे साल टेराकोटा का काम चलता है लेकिन दिवाली से पहले काम कई गुना बढ़ जाता है। इस दौरान कारीगरों के पास आराम का समय भी नहीं रहता। परिवार के सभी सदस्य इस काम में हाथ बंटाते हैं। महिलाएं डिजाइन और रंगाई में सहयोग करती हैं जबकि पुरुष मिट्टी को आकार देने और भट्ठी में पकाने का काम करते हैं।
गोरखपुर की पहचान बन चुकी है टेराकोटा कला
गोरखपुर का टेराकोटा अब सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं रहा। इसकी पहचान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुकी है। खास बात यह है कि यहां के उत्पाद पूरी तरह हाथ से तैयार किए जाते हैं। पारंपरिक डिजाइन और लोक कला की झलक इन्हें खास बनाती है। यही वजह है कि लोग मशीन से बने सामान के बजाय हाथ से बने टेराकोटा उत्पादों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। सरकार की ओडीओपी योजना के बाद इस कला को नई पहचान मिली है। कारीगरों को ट्रेनिंग, मार्केटिंग और प्रदर्शनी का मौका मिला है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और बड़े शहरों के व्यापारियों से संपर्क बढ़ने के बाद कारोबार में तेजी आई है।
औरंगाबाद बना टेराकोटा का सबसे बड़ा केंद्र
गोरखपुर जिले में सबसे ज्यादा टेराकोटा का काम गुलरिहा क्षेत्र के औरंगाबाद में होता है। यहां सैकड़ों परिवार पीढ़ियों से इस कला से जुड़े हैं। इसके अलावा पादरी बाजार, शाहपुर और बशारतपुर में भी बड़ी संख्या में कारीगर काम कर रहे हैं। यही से देशभर के बाजारों में टेराकोटा उत्पाद भेजे जाते हैं। कारीगरों का कहना है कि अगर सरकार की ओर से और बेहतर सुविधाएं तथा बड़े बाजार उपलब्ध कराए जाएं तो गोरखपुर का टेराकोटा कारोबार आने वाले समय में और बड़ी ऊंचाई हासिल कर सकता है। फिलहाल दिवाली से पहले बढ़ती डिमांड ने कारीगरों के घरों में उम्मीद और खुशियों की नई रोशनी जगा दी है।
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