होर्मुज संकट का असर: पेट्रोल-डीजल ही नहीं, साबुन, बिस्कुट और नूडल्स भी होंगे महंगे, घरेलू बजट पर बढ़ेगा दबाव

1 घंटा पहले
पेट्रोल-डीजल ही नहीं, साबुन, बिस्कुट और नूडल्स भी होंगे महंगे, घरेलू बजट पर बढ़ेगा दबाव

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बनी अनिश्चितता का असर अब केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहने वाला है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात लंबे समय तक तनावपूर्ण बने रहे, तो इसका सीधा प्रभाव आम लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों पर पड़ सकता है। साबुन, डिटर्जेंट, प्लास्टिक उत्पाद, बिस्कुट, नूडल्स और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों समेत कई वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर पेट्रोकेमिकल उद्योग पर सबसे पहले पड़ता है। पेट्रोकेमिकल्स से तैयार होने वाले उत्पाद देश के लगभग हर घर में इस्तेमाल किए जाते हैं। ऐसे में कच्चे माल की लागत बढ़ने से कंपनियों के उत्पादन खर्च में इजाफा होगा। जिसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।

रसोई और घरेलू जरूरतों पर सबसे ज्यादा असर

रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा संकट का प्रभाव घरेलू उपभोग की वस्तुओं पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है। साबुन, कपड़े धोने वाले डिटर्जेंट, सफाई उत्पाद और प्लास्टिक से बने सामानों का उत्पादन पेट्रोकेमिकल आधारित कच्चे माल पर निर्भर करता है। ऐसे में इनकी कीमतों में बढ़ोतरी लगभग तय मानी जा रही है। इसके अलावा पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली पैकेजिंग सामग्री भी पेट्रोकेमिकल्स से तैयार होती है। बिस्कुट, नूडल्स, खाद्य तेल और अन्य पैक्ड उत्पाद बनाने वाली कंपनियों को कच्चे माल और परिवहन दोनों मोर्चों पर अतिरिक्त लागत का सामना करना पड़ सकता है। परिणामस्वरूप इन उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

आयात पर निर्भरता बढ़ा रही चिंता

भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल आपूर्ति से जुड़ी किसी भी बाधा का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर तेजी से दिखाई देता है। हालांकि भारत के पास रूस, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों से तेल आयात करने के विकल्प मौजूद हैं। लेकिन लंबा खिंचने वाला संकट स्थिति को जटिल बना सकता है। देश के पास रणनीतिक तेल भंडार भी उपलब्ध है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो केवल भंडार के भरोसे स्थिति को नियंत्रित करना आसान नहीं होगा। कच्चे माल की महंगाई और आपूर्ति में बाधा से उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ेगी। जिसका असर बाजार में वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा।

महंगाई की नई चुनौती

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि होर्मुज क्षेत्र में तनाव कम नहीं हुआ तो आने वाले महीनों में देश को महंगाई की नई चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि से परिवहन लागत बढ़ेगी। जबकि पेट्रोकेमिकल्स महंगे होने से रोजमर्रा के उत्पादों की कीमतें ऊपर जा सकती हैं। ऐसे में घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ना तय माना जा रहा है।

नव्य जागरण

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