मोबाइल नहीं बच्चों को परिवार चाहिए: बदलते सामाजिक माहौल पर SC सख्त, सुप्रीम कोर्ट ने जताई गंभीर चिंता

संयुक्त परिवारों के लगातार टूटने और बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि यदि माता-पिता की भूमिका मोबाइल और अन्य गैजेट्स लेने लगेंगे तो यह समाज के लिए चिंताजनक स्थिति होगी और आने वाली पीढ़ियां पारिवारिक रिश्तों की अहमियत से दूर होती जाएंगी।
हाल के वर्षों में पति-पत्नी की हत्या जैसे मामलों, जिनमें सोनम रघुवंशी प्रकरण भी शामिल है, पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने बदलते सामाजिक परिवेश पर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि आज की पीढ़ी पहले की तुलना में अधिक जागरूक और जानकारी रखने वाली है, लेकिन मानसिक दबाव और सामाजिक चुनौतियों का सामना करने की क्षमता कम होती जा रही है। पीठ ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर प्रसारित संदेशों को बिना जांच-परख के सच मान लेने की प्रवृत्ति चिंताजनक है।
मोबाइल माता-पिता का विकल्प नहीं बन सकता
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी अदालत की चिंता से सहमति जताते हुए कहा कि मानवीय रिश्तों में विश्वास और सहिष्णुता लगातार कम हो रही है। न्यायमूर्ति सुंदरेश ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि एक रेस्तरां में उन्होंने देखा कि बच्चे को व्यस्त रखने के लिए उसके हाथ में मोबाइल थमा दिया गया। उन्होंने कहा कि यदि माता-पिता की जगह गैजेट्स लेने लगें, तो यह समाज के लिए एक बड़ी आपदा होगी।
संयुक्त परिवार को बताया सामाजिक संपत्ति
अदालत ने कहा कि संयुक्त परिवार भारतीय समाज की महत्वपूर्ण ताकत है, लेकिन लोग इसकी अहमियत को समझ नहीं रहे हैं। वास्तविक खुशी भौतिक संसाधनों से नहीं, बल्कि पारिवारिक रिश्तों, संवाद और आपसी विश्वास से मिलती है। कोर्ट ने कहा कि समाज धीरे-धीरे मशीनों जैसा होता जा रहा है, जिसे समय रहते समझने की जरूरत है।
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