आधार का दायरा तय करने की मांग पर आज सुनवाई: पहचान पत्र तक सीमित रखने की अपील, सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार

2 घंटे पहले
पहचान पत्र तक सीमित रखने की अपील, सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार

आधार कार्ड के उपयोग और उसकी कानूनी सीमा को लेकर दायर जनहित याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने की संभावना है। याचिका में मांग की गई है कि आधार कार्ड का उपयोग केवल व्यक्ति की पहचान सत्यापित करने तक सीमित रखा जाए। इसे नागरिकता, निवास अथवा जन्मतिथि के प्रमाण के रूप में स्वीकार न किया जाए। याचिकाकर्ता का कहना है कि वर्तमान में विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी प्रक्रियाओं में आधार का इस्तेमाल पहचान पत्र से कहीं आगे बढ़कर किया जा रहा है, जो आधार अधिनियम, 2016 की मूल भावना और कानूनी प्रावधानों के विपरीत है। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ के समक्ष होने की संभावना है।

अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि आधार कार्ड को लेकर देश में पहचान और नागरिकता के बीच भ्रम की स्थिति बन गई है। याचिका के अनुसार आधार केवल किसी व्यक्ति की पहचान की पुष्टि करने का माध्यम है। लेकिन व्यवहारिक स्तर पर इसे निवास, आयु और नागरिकता के प्रमाण के रूप में भी स्वीकार किया जा रहा है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से अनुरोध किया है कि केंद्र सरकार, निर्वाचन आयोग और संबंधित संस्थाओं को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। जिससे आधार का उपयोग केवल उसकी वैधानिक सीमा के भीतर ही हो।

वोटर रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पर भी उठे सवाल

याचिका में निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े कुछ प्रावधानों पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। इसमें कहा गया है कि नए मतदाता पंजीकरण के दौरान उपयोग किए जाने वाले फॉर्म-6 में आधार को जन्मतिथि और निवास संबंधी दस्तावेज के रूप में स्वीकार किए जाने की व्यवस्था कानूनी विवाद पैदा कर सकती है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि आधार अधिनियम की धारा 9, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 23(4) तथा संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत आधार को नागरिकता या निवास के प्रमाण के रूप में मान्यता नहीं दी गई है। ऐसे में मतदाता सत्यापन प्रक्रिया को और अधिक मजबूत तथा पारदर्शी बनाए जाने की आवश्यकता है।

अवैध दस्तावेजों की आशंका का दावा

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि आधार के व्यापक उपयोग के कारण कई स्थानों पर इसे जन्म प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, स्कूल प्रवेश और संपत्ति संबंधी प्रक्रियाओं में भी स्वीकार किया जा रहा है। याचिकाकर्ता के अनुसार इससे अवैध प्रवासियों या संदिग्ध पहचान वाले व्यक्तियों के लिए अन्य दस्तावेज हासिल करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। इसी आधार पर चुनावी और प्रशासनिक सत्यापन प्रणाली में व्यापक सुधार तथा एक उच्चस्तरीय निगरानी समिति गठित करने का सुझाव भी दिया गया है। इसमें सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों और फॉरेंसिक विशेषज्ञों को शामिल किया जाए।

2018 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने तय की थीं सीमाएं

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 26 सितंबर 2018 को अपने ऐतिहासिक फैसले में आधार अधिनियम को संवैधानिक ठहराया था। लेकिन इसके उपयोग पर कुछ महत्वपूर्ण सीमाएं भी निर्धारित की थीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि बैंक खातों और मोबाइल सिम को आधार से जोड़ना अनिवार्य नहीं किया जा सकता। स्कूलों में प्रवेश के लिए भी आधार की बाध्यता नहीं होगी। हालांकि सरकारी सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए आधार का उपयोग वैध माना गया था।

क्या कहता है आधार अधिनियम?

आधार (वित्तीय और अन्य सब्सिडी, लाभ एवं सेवाओं की लक्षित डिलीवरी) अधिनियम, 2016 के तहत भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) को आधार संख्या जारी करने और उसके उपयोग का अधिकार प्राप्त है। अधिनियम में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है। यह केवल यह दर्शाता है कि संबंधित व्यक्ति भारत का निवासी है। उसकी पहचान का सत्यापन किया जा सकता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई को आधार के उपयोग की सीमा और उसकी वैधानिक स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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