उद्धव ठाकरे को लगा बड़ा झटका: संसदीय दल की बैठक में पहुंचे केवल तीन सांसद, शिवसेना (यूबीटी) में गहराया राजनीतिक संकट

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी भूचाल देखने को मिल रहा है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह लोकसभा सांसदों के बगावत करने और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने की अटकलों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। गुरुवार को दिल्ली में आयोजित शिवसेना (यूबीटी) संसदीय दल की बैठक में नौ में से केवल तीन सांसदों के पहुंचने के बाद इन चर्चाओं को और बल मिल गया। इस बीच शिंदे गुट ने दावा किया है कि छह सांसद उनकी पार्टी के साथ आ चुके हैं। जबकि उद्धव गुट ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला बताते हुए सांसदों को दबाव में रखने और “किडनैप” किए जाने का आरोप लगाया है।
दिल्ली में आयोजित संसदीय दल की बैठक को उद्धव ठाकरे खेमे के लिए शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा था। पार्टी नेतृत्व ने सभी नौ लोकसभा सांसदों को बैठक में उपस्थित रहने के निर्देश दिए थे। लेकिन बैठक में केवल अनिल देसाई, अरविंद सावंत और राजाभाऊ वाजे ही पहुंचे। बाकी छह सांसदों की अनुपस्थिति ने राजनीतिक अटकलों को और तेज कर दिया। बैठक से पहले ही यह चर्चा जोरों पर थी कि कई सांसद पार्टी नेतृत्व से नाराज हैं और शिंदे गुट के संपर्क में हैं।
शिंदे गुट का दावा- ‘ऑपरेशन टाइगर’ सफल
शिवसेना के विधान परिषद सदस्य चंद्रकांत रघुवंशी ने दावा किया कि शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसद अब शिंदे गुट के साथ आ गए हैं। उन्होंने कहा कि लंबे समय से चल रहा ‘ऑपरेशन टाइगर’ अब सफल हो चुका है। सूत्रों के अनुसार, बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भेजकर अलग गुट के रूप में मान्यता और शिंदे नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय की प्रक्रिया शुरू करने की मांग की है। इस संबंध में अभी तक लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय या बागी सांसदों की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
संजय राउत का तीखा हमला
राज्यसभा सांसद और उद्धव ठाकरे के करीबी सहयोगी संजय राउत ने घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी के सांसदों को दबाव में रखा गया है और उन्हें “किडनैप” किया गया है। राउत ने कहा कि जो सांसद बैठक में पहुंचे हैं। वही पार्टी के प्रति वफादार हैं। जबकि अनुपस्थित रहने वालों ने जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात किया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सांसदों को पार्टी छोड़ने के लिए भारी आर्थिक प्रलोभन दिए गए हैं।
दल-बदल कानून में फंसा सियासी गणित
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि नौ में से छह सांसद वास्तव में एक साथ अलग होते हैं, तो उन्हें दल-बदल कानून के तहत राहत मिल सकती है। संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार किसी संसदीय दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य यदि सामूहिक रूप से अलग होकर नया समूह बनाते हैं या किसी अन्य दल में विलय का निर्णय लेते हैं, तो उनकी सदस्यता पर तत्काल खतरा नहीं होता। यही कारण है कि छह सांसदों के संभावित कदम को कानूनी और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
चार साल में दूसरी बड़ी टूट
गौरतलब है कि जून 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के 39 विधायकों ने बगावत कर पार्टी में ऐतिहासिक विभाजन कर दिया था। उसी घटनाक्रम के बाद महाराष्ट्र की सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदल गया था। अब लोकसभा सांसदों के स्तर पर सामने आया यह नया संकट उद्धव ठाकरे के लिए एक और बड़ी राजनीतिक चुनौती बनकर उभरा है। आने वाले दिनों में लोकसभा अध्यक्ष का रुख और बागी सांसदों की औपचारिक घोषणा महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा तय कर सकती है।
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