अप्रैल में थोक महंगाई ने बढ़ाई चिंता: गैस-बिजली और राशन महंगा, ईरान-अमेरिका तनाव से बढ़ा दबाव

देश में महंगाई ने फिर रफ्तार पकड़ ली है। अप्रैल में थोक महंगाई तेजी से बढ़ी। एक महीने में आंकड़ा दोगुने से ऊपर पहुंच गया। मार्च में थोक महंगाई 3.88% थी। अप्रैल में यह बढ़कर 8.30% पहुंच गई। यह पिछले 42 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। अक्टूबर 2022 में महंगाई 8.39% तक पहुंची थी। कॉमर्स मिनिस्ट्री ने बुधवार को नए आंकड़े जारी किए।
महंगाई बढ़ने से बाजार में दबाव बढ़ गया है। रोजाना इस्तेमाल होने वाले सामान महंगे हुए हैं। गैस और बिजली की लागत भी बढ़ी। उद्योगों पर भी उत्पादन लागत का असर दिखा। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि हालात जल्दी नहीं सुधरेंगे। अगर अंतरराष्ट्रीय तनाव बढ़ा, तो मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें उछली हैं। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। इसका असर सीधे ग्लोबल ऑयल मार्केट पर पड़ा। क्रूड ऑयल 100 डॉलर प्रति बैरल पार पहुंच गया। इससे भारत जैसे आयातक देशों की चिंता बढ़ी। भारत अपनी जरूरत का बड़ा तेल बाहर से खरीदता है। ऐसे में तेल महंगा होते ही असर घरेलू बाजार पर दिखता है। ट्रांसपोर्ट महंगा हो जाता है। बिजली उत्पादन की लागत भी बढ़ती है। धीरे-धीरे हर सेक्टर प्रभावित होने लगता है।
रोजमर्रा के सामानों में सबसे ज्यादा असर
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्राइमरी आर्टिकल्स की महंगाई तेजी से बढ़ी। मार्च में यह 6.36% थी। अप्रैल में बढ़कर 9.17% पहुंच गई। इसमें अनाज, दाल, सब्जियां और जरूरी वस्तुएं शामिल हैं। खाने-पीने की चीजों का फूड इंडेक्स भी बढ़ा। मार्च में यह 1.85% था। अप्रैल में यह बढ़कर 1.98% पहुंच गया। हालांकि यह बढ़ोतरी सीमित दिख रही है। लेकिन बाजार में कई जरूरी चीजों के दाम बढ़ चुके हैं। सबसे बड़ा झटका फ्यूल और पावर सेक्टर में लगा। यहां महंगाई दर 1.05% से बढ़कर 24.71% पहुंच गई। गैस, डीजल और बिजली महंगी होने लगी। इसका असर उद्योगों और आम लोगों दोनों पर पड़ा। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी दबाव बढ़ा। यहां महंगाई दर 3.39% से बढ़कर 4.62% रही। फैक्ट्रियों में इस्तेमाल होने वाले मेटल, केमिकल और प्लास्टिक महंगे हुए।
क्या होता है WPI और इसका असर
थोक महंगाई को WPI यानी होलसेल प्राइस इंडेक्स कहा जाता है। यह उन कीमतों को दिखाता है, जिन पर व्यापारी सामान खरीदते हैं। इसमें तीन बड़े हिस्से शामिल होते हैं। मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स का वेटेज सबसे ज्यादा रहता है। इसका हिस्सा 64.23% है। प्राइमरी आर्टिकल्स का वेटेज 22.62% है। फ्यूल एंड पावर का हिस्सा 13.15% है। प्राइमरी आर्टिकल्स में अनाज और सब्जियां आती हैं। नॉन फूड आइटम्स में ऑयल सीड शामिल होते हैं। इसके अलावा मिनरल्स और क्रूड पेट्रोलियम भी शामिल रहता है।
खुदरा महंगाई में भी बढ़ोतरी
अप्रैल में रिटेल महंगाई भी बढ़ी है। मार्च में खुदरा महंगाई 3.40% थी। अप्रैल में यह बढ़कर 3.48% पहुंच गई। फूड इन्फ्लेशन इसका मुख्य कारण रहा। मार्च में फूड इन्फ्लेशन 3.87% था। अप्रैल में यह बढ़कर 4.20% पहुंच गया। इसका असर सीधे आम परिवारों पर पड़ा। रसोई का बजट बढ़ने लगा है। रिटेल महंगाई को CPI कहा जाता है। यह ग्राहक द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत दिखाती है। यानी बाजार में उपभोक्ता जो भुगतान करता है, वही खुदरा महंगाई कहलाती है।
सरकार और बाजार की चुनौती बढ़ी
एक्सपर्ट्स मान रहे हैं कि थोक महंगाई लंबे समय तक ऊंची रही, तो कंपनियां कीमतें और बढ़ाएंगी। उद्योग अपने बढ़ते खर्च का बोझ ग्राहकों पर डाल देंगे। इससे बाजार में और महंगाई बढ़ सकती है। सरकार टैक्स कटौती करके कुछ राहत दे सकती है। पहले भी पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटाई गई थी। लेकिन सरकार लंबे समय तक टैक्स कम नहीं रख सकती। अब सबकी नजर अंतरराष्ट्रीय हालात पर है। अगर ईरान संकट बढ़ा, तो तेल और महंगा होगा। इससे आने वाले महीनों में महंगाई और बढ़ सकती है।
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