कमजोर रुपया और महंगा तेल से भारत पर डबल अटैक: भारतीय मुद्रा में 5% की गिरावट, अर्थव्यवस्था पर बढ़ता दबाव

भारत की अर्थव्यवस्था इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रही है। एक तरफ रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। दूसरी तरफ कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी हुई है। इन दोनों फैक्टर्स ने मिलकर देश पर “डबल अटैक” की स्थिति पैदा कर दी है। 2025 में भारतीय मुद्रा में करीब 5% की गिरावट दर्ज की गई है। इसके बाद भी कमजोरी का ट्रेंड जारी है। हालात ऐसे हैं कि रुपया डॉलर के मुकाबले ही नहीं बल्कि अन्य प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले भी कमजोर हुआ है। इससे इकोनॉमी पर दबाव और बढ़ गया है।
भारतीय रिजर्व बैंक की ताजा रिपोर्ट में कई चिंताजनक संकेत मिले हैं। रुपये का 40-करेंसी रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट आरईईआर गिरकर 92.72 पर आ गया है। यह अपने लंबे समय के औसत 98.25 से काफी नीचे है। इसका मतलब है कि रुपया अपनी सामान्य स्थिति से कमजोर स्तर पर पहुंच गया है। इसके पीछे कई कारण हैं। विदेशी निवेशकों का लगातार पैसा निकालना एक बड़ा कारण है। साथ ही वैश्विक अनिश्चितता भी असर डाल रही है।
डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड गिरावट
इस साल मार्च में रुपया डॉलर के मुकाबले 95.21 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया था। यह अब तक का सबसे कमजोर स्तर माना जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में अब तक रुपये में करीब 4.5% की गिरावट दर्ज की गई है। डॉलर की मजबूत मांग भी इस गिरावट का बड़ा कारण है। खासकर तेल आयात के लिए डॉलर की जरूरत बढ़ी है, जिससे करेंसी पर दबाव बना हुआ है।
महंगा तेल बना बड़ी चिंता
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल देखा जा रहा है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। आयात बिल बढ़ता है। चालू खाता घाटा बढ़ सकता है। साथ ही महंगाई भी ऊपर जा सकती है। कमजोर रुपया इस समस्या को और गंभीर बना देता है, क्योंकि इससे आयात और महंगा हो जाता है।
क्या बताता है आरईईआर
रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट एक अहम आर्थिक इंडिकेटर है। यह किसी देश की मुद्रा की वैल्यू को अन्य देशों की मुद्राओं के मुकाबले दर्शाता है। कमजोर आरईईआर के कुछ फायदे भी होते हैं। इससे निर्यात सस्ता हो जाता है। भारतीय उत्पाद ग्लोबल मार्केट में ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनते हैं। लेकिन इसके नुकसान भी बड़े हैं। आयात महंगा हो जाता है। विदेशी निवेश का मूल्य घट सकता है। इससे निवेशकों का भरोसा भी प्रभावित होता है।
ट्रेड पार्टनर्स के मुकाबले और गिरावट
जब रुपये को भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों के मुकाबले मापा जाता है, तो गिरावट और ज्यादा दिखती है। छह-करेंसी आरईईआर मार्च में गिरकर 89.61 पर पहुंच गया। यह 2015 के बाद सबसे निचला स्तर है। भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, संयुक्त अरब अमीरात, रूस, सऊदी अरब और सिंगापुर शामिल हैं। इन देशों के मुकाबले रुपये की कमजोरी भारत के ट्रेड बैलेंस को प्रभावित कर सकती है।
आगे क्या है संभावनाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल रुपये में जल्दी सुधार की उम्मीद कम है। रिसर्च के अनुसार, डॉलर की मजबूत मांग आगे भी दबाव बनाए रखेगी। वहीं भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन का मानना है कि यह स्थिति लंबी अवधि के निवेशकों के लिए अवसर भी बन सकती है। सस्ता रुपया निवेश को आकर्षित कर सकता है।
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