अमूल के बाद मदर डेयरी ने भी बढ़ाए दूध के दाम: आज से दो रुपये महंगा मिलेगा दूध, पशु चारा और ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट बना बढ़ने की वजह

देशभर में दूध उपभोक्ताओं को बड़ा झटका लगा है। अमूल के बाद मदर डेयरी ने भी कीमतें बढ़ा दीं। दोनों कंपनियों ने दूध के दाम दो रुपये बढ़ाए हैं। नए रेट गुरुवार से लागू होंगे। बढ़ी कीमतों का असर लाखों परिवारों पर पड़ेगा। रसोई का मासिक बजट भी प्रभावित होगा। सबसे पहले अमूल ने कीमत बढ़ाने का ऐलान किया। इसके करीब आधे घंटे बाद मदर डेयरी ने भी फैसला लिया। दोनों कंपनियों ने प्रमुख वेरिएंट के दाम बढ़ाए हैं। नई कीमतें अलग-अलग पैक पर लागू होंगी। कंपनियों ने लागत बढ़ने को वजह बताया है।
गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन ने बयान जारी किया। फेडरेशन के अनुसार, उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है। पशु चारे की कीमतों में बड़ा इजाफा हुआ है। पैकेजिंग और ट्रांसपोर्टेशन खर्च भी बढ़ा है। इसी वजह से दाम बढ़ाने का फैसला लेना पड़ा। अमूल का कहना है कि बढ़ोतरी सीमित रखी गई। कंपनी के मुताबिक, कीमतें केवल 2.5 से 3.5 प्रतिशत बढ़ीं। इससे पहले मई 2025 में भी दाम बढ़े थे। तब भी दूध दो रुपये प्रति लीटर महंगा हुआ था। जून 2024 में भी कीमतों में बदलाव किया गया था। मदर डेयरी ने भी अप्रैल 2025 में दाम बढ़ाए थे। अब एक बार फिर कीमतों में इजाफा किया गया। लगातार बढ़ती लागत से डेयरी कंपनियां दबाव में हैं। कंपनियों का कहना है कि किसानों को बेहतर भुगतान जरूरी है। इसके लिए रिटेल कीमतों में बदलाव करना पड़ता है।
डेयरी इंडस्ट्री पर बढ़ा लागत का दबाव
डेयरी सेक्टर पिछले कुछ वर्षों से दबाव झेल रहा है। पशु चारा लगातार महंगा होता जा रहा है। डीजल और ट्रांसपोर्टेशन खर्च भी बढ़े हैं। बिजली और पैकेजिंग लागत ने मुश्किल बढ़ाई है। इसका सीधा असर दूध उत्पादन पर पड़ा है। कोऑपरेटिव संस्थाओं का कहना है कि किसानों को राहत देना जरूरी है। अगर लागत के अनुसार भुगतान नहीं बढ़ेगा, तो उत्पादन प्रभावित होगा। इसी वजह से समय-समय पर कीमतों में संशोधन करना पड़ता है। कंपनियां इसे संतुलन बनाने की कोशिश बता रही हैं।
तीन स्तर पर काम करता है अमूल मॉडल
अमूल का डेयरी मॉडल देशभर में बेहद चर्चित माना जाता है। यह मॉडल तीन स्तर पर संचालित होता है। सबसे नीचे डेयरी कोऑपरेटिव सोसाइटी होती है। इसके ऊपर डिस्ट्रिक्ट मिल्क यूनियन काम करती है। सबसे ऊपर स्टेट मिल्क फेडरेशन की भूमिका रहती है। गांव के दूध उत्पादक किसान सोसाइटी से जुड़े रहते हैं। यही किसान प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं। डिस्ट्रिक्ट यूनियन दूध की प्रोसेसिंग करती है। इसके बाद उत्पाद बाजार तक पहुंचाए जाते हैं। गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन वितरण संभालता है। अमूल मॉडल को बिजनेस स्कूलों में पढ़ाया जाता है। इसे सफल कोऑपरेटिव सिस्टम का उदाहरण माना जाता है। इस मॉडल में किसानों की सीधी भागीदारी रहती है। मुनाफे का फायदा निचले स्तर तक पहुंचता है।
लाखों किसानों और कर्मचारियों को मिलता रोजगार
अमूल नेटवर्क से लाखों किसान जुड़े हुए हैं। गुजरात के 33 जिलों में हजारों सोसाइटी संचालित हैं। करीब 36 लाख किसान दूध उत्पादन करते हैं। दूध कलेक्शन का काम सुबह जल्दी शुरू हो जाता है। किसान दूध लेकर कलेक्शन सेंटर पहुंचते हैं। कलेक्शन सेंटर पर दूध की मात्रा मापी जाती है। फैट कंटेंट की भी डिजिटल जांच होती है। पूरा सिस्टम ऑटोमेटेड तरीके से संचालित होता है। हर किसान का रिकॉर्ड कंप्यूटर में सेव रहता है। भुगतान सीधे बैंक खातों में भेजा जाता है। डेयरी सेक्टर से करीब 15 लाख लोगों को रोजगार मिलता है। इसमें कलेक्शन, प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन शामिल है। किसानों के लिए मोबाइल ऐप भी तैयार किया गया है। इससे उन्हें भुगतान और दूध की जानकारी मिलती है। दूध के दाम बढ़ने से अब आम उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ गई है। घरेलू बजट पर इसका असर साफ दिखाई देगा। खासतौर पर मध्यमवर्गीय परिवारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
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