अनुसूचित क्षेत्रों में नगरपालिकाओं पर SC का हस्तक्षेप से इनकार: फैसला लेने का हक संसद और सरकार का, प्राइवेट मेंबर बिल लाने की दी सलाह

अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों के शहरी इलाकों में नगरपालिकाओं के गठन की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह नीतिगत और विधायी विषय है। इसलिए इस पर फैसला लेना संसद और सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता सांसद को संबंधित मंत्रालय से संपर्क करने और जरूरत पड़ने पर लोकसभा में प्राइवेट मेंबर बिल लाने की सलाह दी।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों में नगरपालिकाओं के गठन का मामला न्यायिक हस्तक्षेप का नहीं है। अदालत ने कहा कि इस तरह के विषय पर निर्णय लेना विधायिका का अधिकार है। पीठ ने बांसवाड़ा से सांसद और याचिकाकर्ता राजकुमार रोत को सुझाव दिया कि वे अपनी मांग संबंधित मंत्रालय के समक्ष रखें। साथ ही यदि आवश्यक हो तो लोकसभा में प्राइवेट मेंबर बिल लाकर इस मुद्दे को विधायी प्रक्रिया के माध्यम से आगे बढ़ाया जा सकता है।
याचिका में शहरीकरण का दिया गया तर्क
याचिका में कहा गया कि अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों की कई बस्तियां तेजी से शहरी स्वरूप में बदल चुकी हैं। आबादी बढ़ने और विकास होने के बावजूद ये इलाके अब भी नगरपालिका प्रशासन के दायरे से बाहर हैं। याचिकाकर्ता का कहना था कि लंबे समय से विधायी और प्रशासनिक व्यवस्था के अभाव के कारण इन क्षेत्रों के लोगों को शहरी सुविधाओं और स्थानीय प्रशासन का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है।
स्थानीय भागीदारी का भी उठाया मुद्दा
भारत आदिवासी पार्टी के नेता राजकुमार रोत ने याचिका में कहा कि नगरपालिकाओं का गठन न होने से अनुसूचित क्षेत्रों के निवासी स्थानीय शहरी निकायों की निर्णय प्रक्रिया में प्रभावी भागीदारी नहीं कर पा रहे हैं। उनका कहना था कि बदलती परिस्थितियों को देखते हुए इन क्षेत्रों के प्रशासनिक ढांचे पर पुनर्विचार की जरूरत है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि यह नीति निर्धारण से जुड़ा विषय है और इस पर निर्णय लेने का अधिकार संसद तथा सरकार के पास है।










