इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: किशोरावस्था की गलती जीवनभर नहीं बनेगी सजा, पासपोर्ट देने से इनकार गलत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किशोरावस्था में हुई गलती किसी व्यक्ति के पूरे भविष्य पर बोझ नहीं बन सकती। अदालत ने साफ कहा कि किशोर अपराध और उससे जुड़ी सजा किसी व्यक्ति के पुनर्वास, नई शुरुआत और विदेश यात्रा के अधिकार में बाधा नहीं बननी चाहिए। कोर्ट ने यह भी माना कि किशोर न्याय कानून का मकसद बच्चों और किशोरों को “फ्रेश स्टार्ट” यानी नई जिंदगी शुरू करने का अवसर देना है।
यह फैसला न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने पासपोर्ट अधिकारी द्वारा 19 मार्च 2021 को जारी आदेश को रद्द कर दिया। उस आदेश में एक युवक को सिर्फ इसलिए पासपोर्ट देने से मना कर दिया गया था क्योंकि उसे किशोर न्याय बोर्ड ने पहले दोषी माना था।
कोर्ट बोला- कानून का मकसद सजा नहीं, सुधार है
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि उस समय लागू किशोर न्याय अधिनियम 2000 और उससे जुड़े नियमों का उद्देश्य बच्चों और किशोरों का सुधार करना है, न कि उन्हें जिंदगीभर अपराधी मानना। अदालत ने कहा कि किशोर न्याय कानून को मानवीय दृष्टिकोण से पढ़ा और लागू किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी किशोर ने कम उम्र में गलती की है और बाद में वह सामान्य जीवन जीना चाहता है, तो उसकी पुरानी गलती को हमेशा उसके खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कानून का असली उद्देश्य ऐसे बच्चों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाना है।
विदेश यात्रा का अधिकार भी मौलिक अधिकार
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 का जिक्र करते हुए कहा कि विदेश यात्रा करना और पासपोर्ट रखना व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। किसी को पासपोर्ट देने से रोकने के लिए उचित और कानूनी आधार होना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी नागरिक के अधिकारों पर लगाया गया प्रतिबंध निष्पक्ष, तर्कसंगत और संतुलित होना चाहिए। सिर्फ किशोरावस्था की पुरानी दोषसिद्धि के आधार पर पासपोर्ट रोकना संविधान की भावना के खिलाफ है।
अधिकारियों की लापरवाही पर कोर्ट सख्त
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला लंबित नहीं था। इसके बावजूद पासपोर्ट विभाग ने अपने आदेश में “आपराधिक मुकदमा लंबित” होने का उल्लेख कर दिया। कोर्ट ने इसे अधिकारियों की गंभीर लापरवाही बताया। अदालत ने कहा कि बिना तथ्यों की सही जांच किए ऐसा आदेश पारित करना “पूर्ण असावधानी” और “गंभीर गैर-प्रयोग” का उदाहरण है। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों को संवेदनशील मामलों में ज्यादा जिम्मेदारी के साथ काम करना चाहिए।
‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ पर भी अहम टिप्पणी
फैसले में अदालत ने “राइट टू बी फॉरगॉटन” यानी भूल जाने के अधिकार को भी महत्वपूर्ण बताया। कोर्ट ने कहा कि किशोर अपराध से जुड़े रिकॉर्ड हमेशा के लिए किसी व्यक्ति की पहचान नहीं बनने चाहिए। ऐसे रिकॉर्ड को हटाने या नष्ट करने की प्रक्रिया को गंभीरता से लागू किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि किशोर न्याय कानून की धारा 19 स्पष्ट रूप से यह सुरक्षा देती है कि किशोर न्याय बोर्ड की दोषसिद्धि के कारण किसी व्यक्ति को भविष्य में अयोग्य नहीं माना जाएगा। यानी किशोरावस्था की गलती व्यक्ति के करियर, शिक्षा, नौकरी या विदेश यात्रा में स्थायी बाधा नहीं बन सकती।
पासपोर्ट अधिकारी को फिर से आवेदन पर विचार करने का आदेश
हाईकोर्ट ने क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के आवेदन पर दोबारा विचार करे। अदालत ने कहा कि किशोर न्याय बोर्ड की पुरानी दोषसिद्धि को आधार बनाकर पासपोर्ट देने से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर कोई दूसरी कानूनी बाधा नहीं है तो संबंधित व्यक्ति को पासपोर्ट जारी किया जाए। इस फैसले को किशोर अधिकारों और पुनर्वास की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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