इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बिना ठोस आधार नौकरी से हटाना गलत, हेडमास्टर को मिली राहत

प्रयागराज|22 अप्रैल 2026
बिना ठोस आधार नौकरी से हटाना गलत, हेडमास्टर को मिली राहत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि लंबी और बेदाग सेवा देने वाले कर्मचारी को बिना ठोस आधार के नौकरी से हटाना गलत है। गौतम बुद्ध नगर के हेडमास्टर मुकेश कुमार शर्मा की सेवा समाप्ति को कोर्ट ने रद्द कर दिया है। इस फैसले से न सिर्फ याची को राहत मिली है, बल्कि सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर भी एक मजबूत संदेश गया है। कोर्ट ने कहा कि लगभग 30 साल की सेवा के बाद इस तरह की कार्रवाई न्यायसंगत नहीं मानी जा सकती।

मामला मुकेश कुमार शर्मा की सेवा समाप्ति से जुड़ा है। उनकी नियुक्ति वर्ष 1997 में अप्रशिक्षित सहायक अध्यापक के रूप में हुई थी। बाद में उन्होंने प्रशिक्षण पूरा किया और उन्हें नियमित वेतनमान मिलना शुरू हुआ। वर्षों तक उन्होंने बिना किसी विवाद के अपनी सेवाएं दीं। लेकिन वर्ष 2025 में एक शिकायत के आधार पर बेसिक शिक्षा अधिकारी ने उनकी नौकरी समाप्त कर दी। आरोप था कि उन्होंने शैक्षणिक सत्र 1993-94 में एक साथ दो डिग्रियां हासिल की थीं। इसमें इंटरमीडिएट और शारीरिक शिक्षा प्रमाणपत्र शामिल था। इसी आधार पर उनकी योग्यता पर सवाल उठाया गया।

कोर्ट ने उठाए प्रक्रिया पर सवाल

हाईकोर्ट ने इस मामले में सबसे पहले प्रक्रिया को लेकर गंभीर आपत्ति जताई। कोर्ट ने पाया कि सेवा समाप्त करने से पहले न तो कोई नियमित विभागीय जांच की गई और न ही मुकेश कुमार शर्मा को अपनी बात रखने का मौका दिया गया। अदालत ने कहा कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है। साथ ही यह उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक अनुशासन एवं अपील नियमावली के भी खिलाफ है। कोर्ट के अनुसार, किसी भी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले उसे उचित अवसर देना अनिवार्य होता है।

दो डिग्री लेना नहीं है अपराध

कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि एक ही सत्र में दो परीक्षाएं देना अपने आप में कोई अपराध नहीं है, जब तक कि इसके खिलाफ कोई स्पष्ट कानूनी रोक न हो। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ‘कुलदीप कुमार पाठक’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी स्थिति को अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि मुकेश कुमार शर्मा के सभी शैक्षणिक प्रमाणपत्र आज भी वैध हैं। उन्हें किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा रद्द नहीं किया गया है। ऐसे में सिर्फ इस आधार पर उनकी सेवा समाप्त करना पूरी तरह अनुचित है।

बर्खास्तगी आदेश को बताया मनमाना

हाईकोर्ट ने 11 दिसंबर 2025 को जारी बर्खास्तगी आदेश को मनमाना और दोषपूर्ण करार दिया। अदालत ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया और याची को बड़ी राहत दी। कोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया कि प्रशासनिक फैसलों में पारदर्शिता और नियमों का पालन बेहद जरूरी है।

सरकारी कर्मचारियों के लिए बड़ा संदेश

इस फैसले को सरकारी कर्मचारियों के लिए एक अहम मिसाल माना जा रहा है। इससे यह साफ होता है कि लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारियों के साथ मनमानी नहीं की जा सकती। किसी भी कार्रवाई के लिए ठोस आधार और सही प्रक्रिया का पालन जरूरी है।

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