हाईकोर्ट अदालत की सख्त टिप्पणी: पिता बच्चे की अभिरक्षा मनमर्जी से नहीं दे सकता, ऐसा करना कानून और नैतिकता दोनों के खिलाफ

प्रयागराज|30 अप्रैल 2026
पिता बच्चे की अभिरक्षा मनमर्जी से नहीं दे सकता, ऐसा करना कानून और नैतिकता दोनों के खिलाफ

प्रयागराज हाई कोर्ट ने नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा को लेकर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कहा कि यह मान लेना गलत है कि पिता अपने बच्चे की कस्टडी किसी भी व्यक्ति को सौंप सकता है और उसके इस फैसले को कोई चुनौती नहीं दे सकता। अदालत ने इसे कानून और नैतिकता दोनों के खिलाफ बताया। कोर्ट का मानना है कि बच्चे की भलाई सबसे ऊपर है। ऐसे मामलों में किसी एक अभिभावक को असीमित अधिकार नहीं दिया जा सकता। यह फैसला बच्चों के अधिकारों और उनके हितों को प्राथमिकता देने वाला माना जा रहा है।

यह फैसला मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने दिया। खंडपीठ ने पहले दिए गए एकलपीठ के आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही मामले को दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया गया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस केस पर कानून के अनुसार नए सिरे से विचार किया जाए। इस फैसले को न्यायिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह अभिरक्षा से जुड़े अधिकारों की सीमाएं तय करता है।

क्या था पूरा मामला

यह मामला प्रयागराज के युवराज, आयुष्मान और अन्य की विशेष अपील से जुड़ा था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि बच्चों के पिता ने उनकी अभिरक्षा मां को देने के बजाय कुछ अन्य लोगों को सौंप दी। इसे अवैध निरुद्धि यानी गलत तरीके से हिरासत में रखने का मामला बताया गया। इसके खिलाफ बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि बच्चों को उनके वैध अधिकारों से दूर रखा जा रहा है। यह मामला बच्चों के अधिकार और अभिभावकों की जिम्मेदारी के बीच संतुलन से जुड़ा हुआ है।

एकलपीठ का फैसला और उस पर सवाल

इससे पहले एकलपीठ ने याचिका को खारिज कर दिया था। एकलपीठ का कहना था कि पिता, जो कि नाबालिग का नैसर्गिक संरक्षक होता है, उसे अभिरक्षा ट्रांसफर करने का अधिकार है। लेकिन इस फैसले पर सवाल उठाए गए। अपील में कहा गया कि इस तरह का अधिकार असीमित नहीं हो सकता। अगर ऐसा माना जाए तो दूसरे अभिभावक के अधिकार पूरी तरह खत्म हो जाएंगे। यही वजह रही कि मामला खंडपीठ तक पहुंचा और वहां इस पर गंभीरता से सुनवाई हुई।

कोर्ट ने क्या कहा?

खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि पिता का नैसर्गिक संरक्षक होना उसे पूर्ण और असीमित अधिकार नहीं देता। वह अपनी इच्छा से बच्चे को किसी तीसरे व्यक्ति के पास नहीं भेज सकता। साथ ही दूसरे अभिभावक को इस फैसले को चुनौती देने से नहीं रोका जा सकता। अदालत ने कहा कि इस तरह की सोच बच्चों के हितों के खिलाफ है। कानून का मूल सिद्धांत है कि हर निर्णय में बच्चे का सर्वोत्तम हित देखा जाए। यही कारण है कि कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और संतुलित दृष्टिकोण अपनाया।

फैसले का असर और आगे की राह

इस फैसले का असर आने वाले समय में ऐसे मामलों पर पड़ेगा। यह स्पष्ट करता है कि अभिरक्षा केवल अधिकार का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का भी विषय है। माता-पिता दोनों के अधिकारों का सम्मान जरूरी है। साथ ही बच्चे की सुरक्षा और भविष्य सबसे महत्वपूर्ण है। अब यह मामला फिर से एकलपीठ के पास जाएगा, जहां कानून के सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए नया निर्णय लिया जाएगा। यह फैसला न्याय व्यवस्था में संतुलन और संवेदनशीलता का उदाहरण माना जा रहा है।

नव्य जागरण

पूरी खबर पढ़ें ऐप पर

ऐप डाउनलोड करने के लिए QR कोड
ऐप डाउनलोड करने के लिए QR स्कैन करेंGET IT ON Google Play

अधूरा नहीं! पूरी खबर पढ़ें नव्य जागरण ऐप पर

ताजा खबरें, लोकल अपडेट और ब्रेकिंग अलर्ट सीधे अपने मोबाइल पर पाएं।