रिटायरमेंट के बाद वेतन वसूली पर हाईकोर्ट सख्त: गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय से मांगा जवाब, अफसर क्यों नहीं मान रहे कानून?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिटायर कर्मचारियों से अधिक वेतन भुगतान की रिकवरी के मामलों पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव गृह और पुलिस मुख्यालय लखनऊ के वित्त नियंत्रक से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर जवाब मांगा है। हाईकोर्ट ने पूछा है कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद सेवानिवृत्त कर्मचारियों से की जा रही वसूली रोकने के लिए अब तक क्या कार्रवाई की गई है।
कोर्ट ने इस पूरे मामले को बेहद गंभीर मानते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही साफ कर चुका है कि रिटायरमेंट के बाद कर्मचारियों से अतिरिक्त वेतन की रिकवरी नहीं की जा सकती। इसके बावजूद लगातार ऐसे मामले अदालत में आ रहे हैं। इससे साफ है कि प्रशासनिक अधिकारी सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का सही तरीके से पालन नहीं कर रहे हैं। मामले की अगली सुनवाई अब 25 मई को होगी।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला गिरधारी लाल नाम के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी से जुड़ा है। याची का आरोप है कि पुलिस मुख्यालय लखनऊ के वित्त नियंत्रक ने सेवानिवृत्ति के बाद उनसे अधिक वेतन भुगतान की रिकवरी कर ली। इतना ही नहीं, रिटायरमेंट पर मिलने वाले वित्तीय लाभों का भुगतान भी रोक दिया गया। याची ने इस कार्रवाई को अवैध बताते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने कोर्ट को बताया कि उन्होंने 24 जनवरी 2024 को संबंधित विभाग को प्रत्यावेदन दिया था। इसके साथ सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रति भी संलग्न की गई थी। इसके बावजूद अधिकारियों ने उस फैसले पर विचार किए बिना भुगतान से इनकार कर दिया। इसी पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जाहिर की है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश फिर भी नहीं रुक रही रिकवरी
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने “सुशील कुमार सिंघल” केस में पहले ही स्पष्ट निर्देश दिए थे। 16 जनवरी 2007 के शासनादेश के तहत सेवानिवृत्ति के बाद अधिक वेतन भुगतान की रिकवरी पर रोक लगाई जा चुकी है। कोर्ट ने कहा कि यह कानून पूरी तरह स्थापित है। इसके बावजूद विभागीय अधिकारी लगातार रिटायर कर्मचारियों से पैसे की वसूली कर रहे हैं। इससे न केवल कर्मचारियों को मानसिक और आर्थिक परेशानी हो रही है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना भी है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि वित्त नियंत्रक का आदेश “न केवल अवैध है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन भी है।”
अफसरों से व्यक्तिगत हलफनामा, जवाबदेही तय होगी
हाईकोर्ट ने इस मामले को केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं माना। कोर्ट ने साफ कहा कि प्रदेशभर में ऐसे कई मामले लगातार सामने आ रहे हैं। इससे प्रतीत होता है कि विभागीय स्तर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को लागू करने में गंभीर लापरवाही बरती जा रही है। इसी वजह से कोर्ट ने प्रमुख सचिव गृह उत्तर प्रदेश और वित्त नियंत्रक पुलिस मुख्यालय से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने को कहा है। कोर्ट ने पूछा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने और अवैध रिकवरी रोकने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में ऐसे मामलों पर बड़ा असर डाल सकती है। इससे विभागीय अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होगी।
रिटायर कर्मचारियों में बढ़ी उम्मीद
हाईकोर्ट के इस रुख के बाद हजारों सेवानिवृत्त कर्मचारियों में उम्मीद जगी है। लंबे समय से कई विभागों में वेतन विसंगति या तकनीकी त्रुटियों के नाम पर रिटायर कर्मचारियों से रिकवरी की जा रही है। अक्सर कर्मचारियों को रिटायरमेंट के बाद पता चलता है कि विभाग वर्षों पुराने भुगतान को “अधिक वेतन” बताकर वसूल रहा है। इससे पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य परिलाभ प्रभावित हो जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश मामलों में कर्मचारी की कोई गलती नहीं होती। वेतन निर्धारण विभागीय स्तर पर होता है। ऐसे में वर्षों बाद कर्मचारियों से पैसा वसूलना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
25 मई को फिर होगी सुनवाई
हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 25 मई तय की है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार और पुलिस मुख्यालय कोर्ट में क्या जवाब दाखिल करते हैं। अगर कोर्ट अधिकारियों के जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ, तो इस मामले में और कड़ी टिप्पणी या निर्देश भी जारी हो सकते हैं। फिलहाल हाईकोर्ट के सख्त रुख ने साफ संकेत दे दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी अब आसानी से नहीं चलेगी।
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