उर्दू अदब का चमकता सितारा बुझा: 91 वर्ष की उम्र में बशीर बद्र का निधन, डिमेंशिया से जूझ रहे थे मशहूर गजलगो

उर्दू शायरी की दुनिया गुरुवार को गहरे गम में डूब गई। मशहूर शायर और गजलगो डॉ. बशीर बद्र ने 91 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली। उन्होंने भोपाल में दोपहर 12:15 बजे दुनिया को अलविदा कह दिया। लंबे समय से डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे बशीर बद्र की याददाश्त धीरे-धीरे कमजोर हो चुकी थी। उनकी शायरी की चमक कभी फीकी नहीं पड़ी। उनके निधन की खबर सामने आते ही साहित्य, कला और उर्दू अदब से जुड़े लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। शाम 7:30 बजे भोपाल टॉकीज के पास स्थित कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्दे खाक किया जाएगा।
डॉ. बशीर बद्र का नाम उन चुनिंदा शायरों में शामिल रहा है। जिन्होंने उर्दू गजल को नई पीढ़ी तक पहुंचाया और उसे आसान भाषा में आम लोगों के दिलों तक उतारा है। उनकी शायरी में मोहब्बत, तन्हाई, सामाजिक दर्द, रिश्तों की गर्माहट और जिंदगी की तल्ख हकीकतें बेहद खूबसूरती से नजर आती थीं। उनके लिखे शेर सिर्फ मुशायरों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सड़क से संसद तक लोगों की जुबान पर छाए रहे। उनका मशहूर शेर- “कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं कोई बेवफा नहीं होता” आज भी हर टूटे दिल की आवाज माना जाता है।
डिमेंशिया ने छीनी यादें, मगर भूले नहीं शायरी
करीब 14 वर्षों से डिमेंशिया की बीमारी से पीड़ित बशीर बद्र धीरे-धीरे दुनिया और लोगों को भूलते चले गए थे। हालांकि, उनके करीबी बताते हैं कि जब उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र उनके लिखे शेर गुनगुनाती थीं, तो उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान लौट आती थी। कई बार वे खुद भी अधूरा मिसरा पूरा करने लगते थे। मुशायरों की याद आते ही वे ‘इरशाद-इरशाद’ कहने लगते थे, मानो फिर किसी महफिल में मौजूद हों। एक दौर ऐसा था जब किसी भी बड़े मुशायरे की कामयाबी उनके नाम के बिना अधूरी मानी जाती थी।
एक शेर ने बदल दी जिंदगी
15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के कानपुर में जन्मे बशीर बद्र ने कम उम्र में ही शायरी शुरू कर दी थी, लेकिन उन्हें असली पहचान उस शेर से मिली जिसने उन्हें पूरे देश में मशहूर कर दिया।
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।”
बताया जाता है कि 1960 के दशक में मशहूर अभिनेत्री मीना कुमारी ने इस शेर को अपने हाथों से लिखकर एक पत्रिका को भेजा था। इसके बाद बशीर बद्र की लोकप्रियता तेजी से बढ़ती चली गई और वे उर्दू शायरी का बड़ा नाम बन गए।
मेरठ दंगों ने बदल दिया जीवन
1987 के मेरठ दंगों ने बशीर बद्र की जिंदगी को गहरे स्तर पर प्रभावित किया था। दंगों में उनका घर जला दिया गया था। इस दर्द को उन्होंने अपने मशहूर शेर में बयां किया-
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।”
इस घटना के बाद उन्होंने भोपाल को अपना स्थायी ठिकाना बना लिया। यहीं रहकर उन्होंने साहित्य और शायरी की दुनिया में अपनी पहचान को और मजबूत किया।
गजल को दिया नया अंदाज
बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने उर्दू गजल को कठिन शब्दों की कैद से बाहर निकालकर आम बोलचाल की भाषा में ढाला। उन्होंने नए लफ्जों, नए एहसासों और आधुनिक सोच को अपनी शायरी में शामिल किया। यही वजह रही कि युवा पीढ़ी भी उनकी गजलों से खुद को जुड़ा महसूस करती रही। उनके निधन के साथ उर्दू अदब का एक सुनहरा अध्याय जरूर समाप्त हुआ है, लेकिन उनके लिखे शेर आने वाली पीढ़ियों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे।
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