10 घंटे तक घर में पड़ी रही मां की बॉडी: बेटों ने नहीं दिया कंधा, ओडिशा पुलिस ने निभाया इंसानियत का धर्म

1 घंटा पहले
बेटों ने नहीं दिया कंधा, ओडिशा पुलिस ने निभाया इंसानियत का धर्म

ओडिशा के बालेश्वर जिले से एक ऐसी मार्मिक घटना सामने आई है। जिसने रिश्तों की संवेदनहीनता और टूटते पारिवारिक मूल्यों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जिस मां ने अपने बेटों को जन्म देकर उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया है। उसी मां के अंतिम समय में बेटे अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाने से पीछे हट गए। संपत्ति और परंपरा को लेकर दो भाइयों के बीच ऐसा विवाद हुआ कि वृद्ध मां का पार्थिव शरीर करीब 10 घंटे तक घर में पड़ा रहा। आखिरकार पुलिसकर्मियों ने बेटे का फर्ज निभाते हुए न केवल अर्थी को कंधा दिया, बल्कि पूरे सम्मान और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ अंतिम संस्कार भी कराया।

यह घटना बस्ता थाना क्षेत्र के संतोषपुर पंचायत अंतर्गत लोकनाथपुर गांव की है। गांव निवासी बंशीधर दास और उनकी पत्नी तुलसी दास के तीन बेटे थे। बताया जाता है कि बड़ा बेटा लंबे समय से लापता है। बाकी दो बेटों ने आपसी सहमति से माता-पिता की जिम्मेदारियां अलग-अलग बांट ली थीं। मंझले बेटे ने पिता की देखभाल अपने पास रखी थी। वहीं छोटे बेटे राकेश ने मां तुलसी की जिम्मेदारी ली थी। कुछ समय पहले पिता बंशीधर दास का निधन हो गया था। जिसके बाद वृद्धा तुलसी छोटे बेटे के साथ रह रही थीं। मंगलवार को तुलसी दास ने अंतिम सांस ली। मां की मौत के बाद जहां परिवार में शोक का माहौल होना चाहिए था, वहीं अंतिम संस्कार को लेकर दोनों भाइयों के बीच विवाद शुरू हो गया। परिवार वैष्णव परंपरा से जुड़ा होने के कारण मंझला बेटा और गांव के कुछ लोग चाहते थे कि वृद्धा का अंतिम संस्कार घर के परिसर में ही किया जाए। दूसरी ओर छोटा बेटा राकेश इस बात पर अड़ा रहा कि उसकी मां की अंतिम इच्छा नदी किनारे अंतिम संस्कार कराने की थी। इसी बात को लेकर दोनों भाइयों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई।

जिद के आगे रिश्ते पड़े कमजोर

देखते ही देखते विवाद इतना बढ़ गया कि किसी ने भी मां के पार्थिव शरीर को हाथ लगाने तक की पहल नहीं की। वृद्धा की बॉडी घर के भीतर पड़ी रही और दोनों भाई अपनी-अपनी जिद पर अड़े रहे। गांव वालों ने काफी समझाने का प्रयास किया, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल सका। करीब 10 घंटे तक बॉडी घर में ही पड़ी रही। घटना की चर्चा पूरे गांव में फैल गई और लोग बेटों के व्यवहार को लेकर नाराजगी जताने लगे। आखिरकार मामले की सूचना अमरदारोड पुलिस चौकी को दी गई। सूचना मिलते ही चौकी प्रभारी विजय कुमार बारिक अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे। पुलिस अधिकारियों ने दोनों भाइयों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन जब कोई रास्ता नहीं निकला तो पुलिसकर्मियों ने खुद आगे बढ़कर इंसानियत का उदाहरण पेश किया।

पुलिसकर्मियों ने निभाया बेटे का फर्ज

चार पुलिसकर्मियों ने वृद्धा की अर्थी को कंधा दिया और बॉडी को सुवर्णरेखा नदी स्थित ओड़ियापड़ा बालू घाट ले गए। वहां पूरे धार्मिक रीति-रिवाज और सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कराया गया। पुलिसकर्मियों ने समाधि के लिए मिट्टी खोदने से लेकर अंतिम संस्कार की सभी जिम्मेदारियां खुद निभाईं। इस दौरान गांव के कई लोग भी मौजूद रहे और पुलिस की संवेदनशीलता की सराहना करते नजर आए।

गांव में बेटों की हो रही आलोचना

घटना के बाद गांव में दोनों बेटों की जमकर आलोचना हो रही है। ग्रामीणों का कहना है कि संपत्ति और अहंकार ने रिश्तों की भावनाओं को खत्म कर दिया है। जिन माता-पिता ने पूरी जिंदगी बच्चों के लिए संघर्ष किया, उन्हीं को बेटों ने जिम्मेदारियों और हिस्सों में बांट दिया। लोगों ने कहा कि वैष्णव परंपरा करुणा और संवेदना का संदेश देती है, लेकिन इस परिवार ने उसी भावना को भुला दिया। वहीं दूसरी ओर पुलिसकर्मियों की मानवता और संवेदनशीलता की हर तरफ प्रशंसा हो रही है। लोगों का कहना है कि वर्दी में मौजूद इन पुलिसवालों ने साबित कर दिया कि इंसानियत आज भी जिंदा है।

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