RBI का रिकॉर्ड डिविडेंड: सरकार को 2.87 लाख करोड़ रुपये की बड़ी राहत, तेल संकट और बढ़ते खर्च के बीच सरकार को सहारा

भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को 2.87 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड डिविडेंड देने की घोषणा की है। RBI के सेंट्रल बोर्ड की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। यह अब तक का सबसे बड़ा डिविडेंड भुगतान माना जा रहा है। पिछले वित्त वर्ष में RBI ने सरकार को 2.69 लाख करोड़ रुपये का सरप्लस ट्रांसफर किया था। इस बार यह राशि करीब सात प्रतिशत अधिक है। ऐसे समय में जब मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार अस्थिर बनी हुई हैं, RBI से मिली यह बड़ी रकम केंद्र सरकार के लिए आर्थिक राहत और सुरक्षा कवच के रूप में देखी जा रही है।
ईरान-इजराइल तनाव के चलते ग्लोबल मार्केट में क्रूड ऑयल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। बढ़ती तेल कीमतों के बीच खाद और ईंधन सब्सिडी का बोझ भी सरकार पर बढ़ रहा है। ऐसे में RBI का यह रिकॉर्ड डिविडेंड सरकार को बजट संतुलित रखने और वित्तीय दबाव कम करने में मदद करेगा। आर्थिक जानकारों का मानना है कि इससे सरकार को बाजार से अतिरिक्त कर्ज लेने की जरूरत कुछ हद तक कम हो सकती है।
RBI की कमाई और बैलेंस शीट में बड़ा उछाल
रिजर्व बैंक ने बताया कि उसकी कुल आय में पिछले साल की तुलना में करीब 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वहीं बैंक की बैलेंस शीट भी लगभग 20 प्रतिशत बढ़कर 92 लाख करोड़ रुपये के करीब पहुंच गई है। RBI का सकल मुनाफा इस साल 3.95 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले काफी ज्यादा है। हालांकि बैंक के खर्चों में भी लगभग 28 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके बावजूद रिजर्व बैंक ने सरकार को अब तक की सबसे बड़ी राशि ट्रांसफर की है।
रिस्क बफर घटाकर बढ़ाया गया सरप्लस
इस बार RBI ने अपने कंटीजेंसी रिस्क बफर यानी इमरजेंसी फंड में कटौती करने का फैसला किया। पहले रिजर्व बैंक अपनी कुल संपत्ति का 7.5 प्रतिशत हिस्सा इस फंड में सुरक्षित रखता था, जिसे घटाकर 6.5 प्रतिशत कर दिया गया। इसी वजह से RBI के पास ज्यादा सरप्लस बचा और सरकार को अधिक डिविडेंड मिल सका। विशेषज्ञों के मुताबिक यह फैसला मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए लिया गया है, ताकि सरकार को अतिरिक्त वित्तीय ताकत मिल सके।
बॉन्ड यील्ड बढ़ने से महंगा हुआ कर्ज
मिडिल ईस्ट संकट का असर भारतीय वित्तीय बाजारों पर भी दिखने लगा है। सरकारी बॉन्ड यील्ड में तेजी आने से कंपनियों के लिए बाजार से कर्ज लेना महंगा हो गया है। रेटिंग एजेंसी ICRA की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो सरकार के वित्तीय घाटे पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि RBI का यह भारी डिविडेंड घाटे को नियंत्रित रखने में अहम भूमिका निभाएगा। आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले महीनों में वैश्विक हालात और तेल बाजार की दिशा भारत की आर्थिक रणनीति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
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