ऑनलाइन फूड और क्विक कॉमर्स डिलीवरी हो सकती है महंगी: पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से कंपनियों पर दबाव, ग्राहकों की जेब पर बढ़ेगा बोझ

2 घंटे पहले
 पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से कंपनियों पर दबाव, ग्राहकों की जेब पर बढ़ेगा बोझ

ऑनलाइन फूड डिलीवरी और क्विक कॉमर्स सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों को आने वाले दिनों में अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है। इंटरनेशनल स्तर पर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर अब भारतीय बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी के चलते स्विगी और जोमौटो जैसी कंपनियों की डिलीवरी लागत बढ़ गई है। इसके चलते कंपनियां डिलीवरी चार्ज, प्लेटफॉर्म फीस और अन्य शुल्कों में बढ़ोतरी कर सकती हैं, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा।

रिपोर्ट के अनुसार, देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में करीब चार प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। ईंधन की कीमतें बढ़ने से सबसे अधिक दबाव उन कंपनियों पर पड़ रहा है, जिनका कारोबार बड़े स्तर पर डिलीवरी नेटवर्क पर निर्भर करता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो कंपनियों के मुनाफे में 10 से 12 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की जा सकती है। ऐसे में कंपनियां अपने बढ़ते खर्च की भरपाई ग्राहकों से अतिरिक्त शुल्क लेकर कर सकती हैं।

पहले ही बढ़ चुकी है प्लेटफॉर्म फीस

दरअसल, ऑनलाइन फूड डिलीवरी कंपनियां पिछले कुछ समय से लगातार अपनी फीस बढ़ा रही हैं। मार्च 2026 में ही जोमैटो और स्विगी दोनों ने प्लेटफॉर्म फीस में इजाफा किया था। जोमैटो ने प्रति ऑर्डर लगने वाली फीस में करीब 19 प्रतिशत की बढ़ोतरी की, जबकि स्विगी ने भी अपने शुल्क में वृद्धि कर दी। एक्सपर्ट्स का मानना है कि बढ़ती परिचालन लागत के कारण अब यह बढ़ोतरी और तेज हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान समय में क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर प्रति ऑर्डर औसत डिलीवरी लागत 35 से 50 रुपये तक आती है, जबकि फूड डिलीवरी में यह खर्च 55 से 60 रुपये तक पहुंच जाता है। कुल लागत में ईंधन का हिस्सा करीब 20 प्रतिशत माना जाता है। ऐसे में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में हुई हालिया बढ़ोतरी से कंपनियों को हर ऑर्डर पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव झेलना पड़ रहा है।

ग्राहकों और डिलीवरी पार्टनर्स दोनों पर असर

एक्सपर्ट्स का कहना है कि यदि ईंधन की कीमतों में और बढ़ोतरी होती है, तो इसका असर केवल ग्राहकों तक सीमित नहीं रहेगा। डिलीवरी पार्टनर्स, जिन्हें आमतौर पर गिग वर्कर्स कहा जाता है, उनकी आमदनी भी प्रभावित होगी। पेट्रोल महंगा होने से उनकी बचत कम हो रही है, जिसके चलते वे कंपनियों से प्रति ऑर्डर भुगतान बढ़ाने की मांग कर सकते हैं। यदि कंपनियां यह मांग पूरी नहीं करती हैं तो डिलीवरी नेटवर्क पर असर पड़ सकता है और सेवाओं में देरी जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।

तीन स्तर पर बांटा जाएगा अतिरिक्त बोझ

रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि आने वाले वित्त वर्ष में करोड़ों ऑर्डर्स को संभालने वाली ये कंपनियां बढ़ती लागत का बोझ तीन स्तरों पर बांटेंगी। पहला, ग्राहकों से अतिरिक्त डिलीवरी या हैंडलिंग फीस वसूली जाएगी। दूसरा, कंपनियां अपने मुनाफे का एक हिस्सा कम करके कुछ खर्च खुद वहन करेंगी। तीसरा, डिलीवरी पार्टनर्स के भुगतान ढांचे में बदलाव कर लागत को संतुलित करने की कोशिश की जाएगी।

नव्य जागरण

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