लावरोव ने भारत-ब्राजील की स्थायी सदस्यता का किया समर्थन: पश्चिमी देशों की सीटों का विरोध, 15 सदस्यीय परिषद में 5 स्थायी सदस्य

पश्चिमी देशों की सीटों का विरोध,  15 सदस्यीय परिषद में 5 स्थायी सदस्य

रूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन दोहराया है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा कि परिषद के विस्तार में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका का प्रतिनिधित्व बढ़ना चाहिए। उन्होंने भारत और ब्राजील की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया। साथ ही पश्चिमी देशों के लिए अतिरिक्त स्थायी सीटों का विरोध किया। लावरोव ने खास तौर पर जर्मनी और जापान का उल्लेख किया। उन्होंने सुरक्षा परिषद में सुधार के दौरान मौजूदा स्थायी सदस्यों के अधिकारों और शक्तियों को बनाए रखने की बात भी कही।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका पांच स्थायी सदस्य हैं। इन पांचों के पास वीटो अधिकार है। बाकी 10 सदस्य गैर-स्थायी होते हैं और उन्हें दो साल के कार्यकाल के लिए चुना जाता है। संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक भारत अब तक आठ बार गैर-स्थायी सदस्य के रूप में परिषद में रह चुका है।

भारत की स्थायी सदस्यता की मांग दशकों पुरानी

भारत की स्थायी सदस्यता की मांग लंबे समय से चल रही है। 2008 से सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर औपचारिक बातचीत का दौर जारी रहा है। 2010 में भारत ने ब्राजील, जर्मनी और जापान के साथ जी-4 समूह के जरिए स्थायी सीट की मांग को आगे बढ़ाया। 2026 में भी सुरक्षा परिषद के सुधार पर चर्चा जारी है, लेकिन नए ढांचे को लेकर सदस्य देशों में सहमति नहीं बनी है।

परिषद में बदलाव के लिए चार्टर संशोधन जरूरी

सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन करना होगा। इसके लिए महासभा में दो-तिहाई बहुमत के साथ सदस्य देशों की निर्धारित औपचारिक मंजूरी जरूरी होगी। मौजूदा पांच स्थायी सदस्यों की भूमिका भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण है। सुरक्षा परिषद के निर्णयों में स्थायी सदस्यों का वीटो अधिकार चार्टर में निर्धारित है।

चीन की स्थायी सीट के समर्थन का पुराना संदर्भ

भारत और चीन के संबंधों के संदर्भ में सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का एक पुराना प्रसंग भी सामने आता है। 1950 में जवाहरलाल नेहरू चीन को संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में शामिल कराने के पक्ष में थे। बाद में 1955 में भारत को स्थायी सीट का प्रस्ताव मिलने और उसे चीन के लिए छोड़ने की चर्चा हुई। नेहरू ने संसद में इस दावे को खारिज करते हुए कहा था कि भारत को सदस्यता का कोई औपचारिक या अनौपचारिक प्रस्ताव नहीं मिला था।

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