एक देश-एक चुनाव पर चिदंबरम का वार: बोले- विधानसभा का कार्यकाल घटाना असंवैधानिक, संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ

नई दिल्ली|24 अगस्त 2026
बोले- विधानसभा का कार्यकाल घटाना असंवैधानिक, संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ

पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की पहल का विरोध किया है। सोमवार को संसद की संयुक्त समिति के सामने अपनी राय रखते हुए उन्होंने इससे जुड़े प्रस्ताव को “राक्षसी” और “असंवैधानिक” बताया। चिदंबरम ने कहा कि पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने की योजना बिना पर्याप्त विचार के तैयार की गई है। उनके मुताबिक, संविधान के तहत लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल पांच साल निर्धारित है, इसलिए इसे घटाना संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ होगा।

चिदंबरम ने संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 को समिति के सामने असंवैधानिक बताया। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने कहा कि एक साथ चुनाव कराने के लिए निर्वाचित सदनों के कार्यकाल में बदलाव करना संवैधानिक व्यवस्था से छेड़छाड़ होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका जमीर इन दोनों विधेयकों का समर्थन करने की अनुमति नहीं देता। तृणमूल कांग्रेस की समिति सदस्य सागरिका घोष ने भी प्रस्ताव का विरोध किया और कहा कि इससे चुनाव आयोग को जरूरत से ज्यादा अधिकार मिल सकते हैं।

अपनी राय रखने पहुंचे 10 पद्म पुरस्कार विजेता

भाजपा सांसद पीपी चौधरी की अध्यक्षता वाली समिति के समक्ष करीब 10 पद्म पुरस्कार विजेता भी अपनी राय रखने पहुंचे। इनमें तरलोचन सिंह, नवीन खन्ना, मीनाक्षी जैन और नीरू कुमार शामिल थे। समिति के सामने इन लोगों की राय बंटी हुई नजर आई। कुछ पद्म पुरस्कार विजेताओं ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के विचार का समर्थन किया। वहीं, कुछ ने आशंका जताई कि इससे देश में अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है।

दिसंबर 2024 में लोकसभा में रखे गए थे विधेयक

दोनों विधेयक दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किए गए थे। इसके बाद इन्हें विस्तृत जांच और विचार के लिए संसद की संयुक्त समिति को भेज दिया गया। इन प्रस्तावों की पृष्ठभूमि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली हाईलेवल कमेटी की सिफारिशों से जुड़ी है। समिति ने लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव चरणबद्ध तरीके से एक साथ कराने की सिफारिश की थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी इस कमेटी के सदस्य रहे हैं।

1951 से 1967 तक एक साथ होते रहे चुनाव

देश में एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था नई नहीं है। संविधान लागू होने के बाद 1951-52 से 1967 तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए गए। 1951-52 के बाद 1957, 1962 और 1967 में भी यही व्यवस्था जारी रही। हालांकि, 1968 और 1969 में कुछ राज्य विधानसभाएं समय से पहले भंग होने के बाद यह चुनावी चक्र टूट गया। 1970 में चौथी लोकसभा भी समय से पहले भंग हुई और 1971 में नए चुनाव कराए गए।

समय से पहले सदन भंग होने से टूटा चुनावी चक्र

पहली, दूसरी और तीसरी लोकसभा ने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया था। वहीं, आपातकाल के दौरान पांचवीं लोकसभा का कार्यकाल संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत 1977 तक बढ़ाया गया। इसके बाद कुछ ही लोकसभाएं अपना पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा कर सकीं। आठवीं, दसवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं लोकसभा ने पांच साल पूरे किए, जबकि छठी, सातवीं, नौवीं, 11वीं, 12वीं और 13वीं लोकसभा समय से पहले भंग हो गईं। राज्य विधानसभाओं में भी कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग होने और कार्यकाल बढ़ने की घटनाओं ने चुनावों का पुराना चक्र बदल दिया। इसी वजह से देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होने की मौजूदा व्यवस्था बनी।

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