गोरखपुर में साइबर फ्रॉड का गोल्ड रूट: 11 करोड़ के खरीदे गहने, जांच के लिए पहुंची मुंबई साइबर सेल

साइबर ठगी से अर्जित करोड़ों रुपये की रकम को खपाने के लिए जालसाजों द्वारा ज्वेलरी कारोबार का इस्तेमाल किए जाने का बड़ा मामला सामने आया है। मुंबई में दर्ज एक साइबर फ्रॉड केस की जांच के दौरान खुलासा हुआ है कि ठगी से हासिल धनराशि का उपयोग कर गोरखपुर के विभिन्न ज्वेलरी शोरूमों से करीब 11 करोड़ रुपये मूल्य का सोना और आभूषण खरीदे गए। मामले की गंभीरता को देखते हुए मुंबई क्राइम ब्रांच की साइबर सेल की टीम गोरखपुर, देवरिया और कुशीनगर में डेरा डाले हुए है। साइबर टीम नेटवर्क से जुड़े संदिग्धों की तलाश में लगातार छापेमारी कर रही है।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि साइबर अपराधियों ने ठगी की रकम का सीधे इस्तेमाल करने के बजाय उसे पहले तथाकथित ‘म्यूल खातों’ में ट्रांसफर कराया। इसके बाद अलग-अलग बैंक खातों के माध्यम से शहर के ज्वेलरी प्रतिष्ठानों के खातों में ऑनलाइन भुगतान किया गया। भुगतान की पुष्टि होने के बाद गिरोह से जुड़े लोग दुकानों पर पहुंचते थे। सोने के गहने और अन्य कीमती आभूषण लेकर चले जाते थे। सूत्रों के अनुसार यह पूरा नेटवर्क पिछले लगभग तीन माह से सक्रिय था। सुनियोजित तरीके से लेनदेन को अंजाम दिया जा रहा था।
सिविल लाइंस और असुरन के शोरूम जांच के दायरे में
जांच एजेंसियों को जानकारी मिली है कि शहर के सिविल लाइंस और असुरन क्षेत्र स्थित कई प्रमुख ज्वेलरी प्रतिष्ठानों से सबसे अधिक खरीदारी की गई। कई मामलों में जालसाज पहले ऑनलाइन एडवांस भुगतान कर देते थे। अगले दिन अपने प्रतिनिधियों को भेजकर गहनों की डिलीवरी प्राप्त कर लेते थे। बैंक खाते में धनराशि पहुंचने के कारण कारोबारियों को किसी प्रकार का संदेह नहीं हुआ। मुंबई साइबर सेल की टीम अब तक शहर के चार प्रमुख ज्वेलरी शोरूमों में पहुंचकर खरीद-बिक्री से जुड़े दस्तावेजों की जांच कर चुकी है। साथ ही सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं। गहने लेने पहुंचे व्यक्तियों की पहचान कर पूरे नेटवर्क तक पहुंचने का प्रयास किया जा रहा है।
स्थानीय युवकों की भूमिका भी जांच के घेरे में
जांच एजेंसियों को आशंका है कि गिरोह ने स्थानीय स्तर पर कई युवकों को कमीशन के आधार पर अपने नेटवर्क से जोड़ा था। जांच के दौरान गोपालगंज और देवरिया के दो संदिग्ध व्यक्तियों के नाम भी सामने आए हैं। उनके बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और वित्तीय लेनदेन की विस्तृत पड़ताल की जा रही है। साइबर सेल यह पता लगाने में जुटी है कि ठगी की रकम किन-किन खातों से होकर ज्वेलरी प्रतिष्ठानों तक पहुंची और सोना खरीदने के बाद उसे कहां तथा किस माध्यम से खपाया गया।
ज्वेलरी कारोबारियों में बढ़ी चिंता
मामले के खुलासे के बाद ज्वेलरी कारोबारियों में भी चिंता का माहौल है। कारोबारियों का कहना है कि किसी ग्राहक की ओर से भुगतान सीधे बैंक खाते में प्राप्त होने के बाद उसके धन के स्रोत या मंशा की जांच करना आसान नहीं होता। फिलहाल मुंबई साइबर सेल की टीम खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड, भुगतान के तरीकों और संदिग्ध ग्राहकों से जुड़े दस्तावेजों को खंगाल रही है। एसपी सिटी निमिष पाटील ने बताया कि साइबर ठगी की रकम से सोना खरीदने के मामले में मुंबई से आई साइबर सेल की टीम जांच कर रही है। स्थानीय पुलिस हर स्तर पर सहयोग प्रदान कर रही है।
क्या होता है म्यूल खाता?
साइबर अपराधी आमतौर पर ठगी की रकम सीधे अपने बैंक खातों में नहीं मंगाते। इसके लिए वे अन्य लोगों के बैंक खातों का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें ‘म्यूल अकाउंट’ कहा जाता है। बेरोजगार युवकों, मजदूरों या आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को लालच देकर उनके बैंक खाते किराये पर ले लिए जाते हैं। कई मामलों में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर खाते खुलवाए जाते हैं। ठगी की रकम पहले इन्हीं खातों में जमा होती है। बाद में दूसरे खातों या कारोबारियों तक पहुंचा दी जाती है। इससे धन के वास्तविक स्रोत का पता लगाना जांच एजेंसियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
साइबर अपराधियों की पहली पसंद बन रहा सोना
जांच एजेंसियों के अनुसार साइबर ठगी की रकम को वैध संपत्ति में बदलने के लिए अपराधी तेजी से सोने का सहारा ले रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि सोना आसानी से खरीदा और बेचा जा सकता है। करोड़ों रुपये की रकम को कम वजन में सुरक्षित रखा जा सकता है। वहीं, गहनों को पिघलाकर उनकी पहचान भी समाप्त की जा सकती है। यही कारण है कि हाल के वर्षों में साइबर अपराध से जुड़े कई बड़े मामलों में सोने की खरीदारी का पैटर्न लगातार सामने आ रहा है। जांच एजेंसियां अब इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलने और ठगी की रकम के अंतिम उपयोग तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं।











