संविधान के शिल्पकार बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर: वो महानायक जिन्होंने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को दिया 'समानता का कवच'

14 अप्रैल 2026
वो महानायक जिन्होंने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को दिया 'समानता का कवच'

आज 14 अप्रैल को जब देश अपनी आजादी के अमृत काल में आगे बढ़ रहा है, तब भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। उन्हें अक्सर 'भारतीय संविधान का जनक' कहा जाता है, लेकिन यह केवल एक उपाधि नहीं बल्कि उनके उस कठिन परिश्रम का सम्मान है, जिसने भारत की विविधताओं को एक सूत्र में पिरोने का काम किया।

इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें याद करते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट किया- "समता, न्याय और बंधुत्व के उच्च आदर्शों से आलोकित, समरस एवं समावेशी समाज की आधारशिला रखने वाले भारतीय संविधान के शिल्पकार 'भारत रत्न' बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर जी की जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि। अंत्योदय और लोक-कल्याण के प्रति समर्पित बाबा साहब सच्चे अर्थों में माँ भारती के अमूल्य रत्न हैं। उनका प्रेरक जीवन हम सभी के लिए सदैव पथप्रदर्शक रहेगा।"

कठिन परिस्थितियों में संविधान बनाने का जिम्मा

15 अगस्त 1947 को भारत आजाद तो हुआ, लेकिन उसके पास अपना कोई कानून नहीं था। देश रियासतों में बंटा था और समाज जाति-धर्म की गहरी खाइयों में फंसा था। ऐसे समय में 29 अगस्त 1947 को संविधान की 'प्रारूप समिति' का गठन किया गया और इसकी कमान सौंपी गई डॉ. भीमराव अंबेडकर को। यह जिम्मेदारी आसान नहीं थी। उन्हें एक ऐसा ढांचा तैयार करना था जो सदियों से शोषित समाज को न्याय दिला सके और साथ ही अखंड भारत की नींव भी रखे।

2 साल, 11 महीने और 18 दिनों का संकलन

बाबासाहेब ने दुनिया के 60 से अधिक देशों के संविधानों का गहन अध्ययन किया। वे रात-रात भर जागकर मसौदे तैयार करते थे। संविधान सभा की बहसों में जब भी किसी अनुच्छेद पर विवाद होता, तो डॉ. अंबेडकर अपनी तर्कशक्ति और विद्वता से उसका समाधान निकालते थे। उन्होंने कुल 2 साल, 11 महीने और 18 दिनों तक निरंतर कार्य किया। इस दौरान उन्होंने करीब 7,600 संशोधनों पर चर्चा की और अंततः 2,473 संशोधनों का निपटारा किया। उनकी मेहनत का परिणाम था कि 26 नवंबर 1949 को भारत ने अपना संविधान अपनाया।

समानता के अधिकार और सामाजिक क्रांति में भूमिका

डॉ. अंबेडकर का सबसे बड़ा योगदान संविधान के 'तीसरे भाग' में निहित मौलिक अधिकार हैं। उन्होंने अनुच्छेद 14 से 18 के जरिए समानता का अधिकार दिया और अनुच्छेद 17 के माध्यम से छुआछूत को जड़ से खत्म करने का कानून बनाया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि भारत का हर नागरिक, चाहे वह राजा हो या रंक, कानून की नजर में एक बराबर होगा। 'एक व्यक्ति-एक वोट' का सिद्धांत देकर उन्होंने सदियों से चली आ रही ऊंच-नीच की व्यवस्था पर गहरी चोट की।

अनुच्छेद 32: भारत के संविधान की आत्मा

संविधान निर्माण के दौरान बाबासाहेब ने अनुच्छेद 32 को संविधान की 'आत्मा और हृदय' कहा था। उनका मानना था कि यदि किसी नागरिक के अधिकारों का हनन होता है, तो वह सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकता है। यह प्रावधान ही हमारे लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखता है। बाबासाहेब ने केवल कानून की किताब नहीं लिखी, बल्कि उन्होंने एक सामाजिक दस्तावेज तैयार किया। उन्होंने देश को सिखाया कि "संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग बुरे होंगे, तो वह अंततः बुरा ही साबित होगा।"

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