सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर केस में सभी आरोपी बरी: बॉम्बे हाईकोर्ट बोला- सिर्फ शक के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती, ट्रायल कोर्ट के फैसले को रखा बरकरार

करीब दो दशक तक देश की राजनीति, पुलिस सिस्टम और न्यायिक बहस के केंद्र में रहे सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साल 2005 के चर्चित सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले में सभी 22 आरोपियों को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सजा देने के लिए ठोस और भरोसेमंद सबूत जरूरी होते हैं। अदालत ने कहा कि इस मामले में अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में असफल रहा।
यह फैसला मुख्य न्यायाधीश आलोक आराधे और न्यायमूर्ति गौतम अंखड़ की खंडपीठ ने सुनाया। कोर्ट ने सोहराबुद्दीन के भाइयों रुबाबुद्दीन और नयाबुद्दीन शेख की अपील खारिज कर दी। दोनों ने विशेष सीबीआई अदालत के फैसले को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी खामी नहीं मिली।
क्या था पूरा मामला
यह मामला नवंबर 2005 में शुरू हुआ था। आरोप था कि सोहराबुद्दीन, उनकी पत्नी कौसर बी और सहयोगी तुलसीराम प्रजापति का गुजरात और राजस्थान पुलिस की टीम ने बस से अपहरण किया था। इसके बाद सोहराबुद्दीन को 26 नवंबर 2005 को कथित फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया गया। तीन दिन बाद उनकी पत्नी कौसर बी की भी हत्या कर दी गई। बाद में दिसंबर 2006 में इस केस के अहम गवाह माने जा रहे तुलसीराम प्रजापति की भी एनकाउंटर में मौत हो गई।
इस केस ने पूरे देश में सनसनी मचा दी थी। आरोप लगे कि पुलिस अधिकारियों ने मिलकर फर्जी कहानी तैयार की और तीनों को रास्ते से हटा दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। इसके बाद जांच गुजरात सीआईडी से लेकर सीबीआई को सौंप दी गई। निष्पक्ष सुनवाई के लिए केस को गुजरात से मुंबई ट्रांसफर किया गया।
92 गवाह मुकर गए, केस कमजोर पड़ गया
इस मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब बड़ी संख्या में गवाह अपने बयान से पलट गए। विशेष सीबीआई अदालत में कुल 210 गवाह पेश किए गए थे। इनमें से 92 गवाह मुकदमे के दौरान मुकर गए। इससे अभियोजन पक्ष का पूरा केस कमजोर पड़ गया। दिसंबर 2018 में विशेष सीबीआई कोर्ट ने सबूतों के अभाव में बाकी बचे 22 आरोपियों को बरी कर दिया था। अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि यह मुठभेड़ फर्जी थी या आरोपियों की भूमिका अपराध में थी। इसी फैसले को चुनौती देते हुए सोहराबुद्दीन के भाइयों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
कई बड़े नाम पहले ही हो चुके थे बरी
इस हाईप्रोफाइल केस में कई बड़े अफसरों और नेताओं के नाम सामने आए थे। अमित शाह, पूर्व आईपीएस अधिकारी डी.जी. वनजारा, आईएएस अधिकारी राजकुमार पांडियन और आईपीएस अधिकारी दिनेश एमएन समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों को पहले ही सबूतों के अभाव में बरी किया जा चुका था। जिन 22 लोगों को अब अंतिम रूप से राहत मिली है, उनमें गुजरात और राजस्थान पुलिस के जूनियर स्तर के अधिकारी शामिल थे। उन पर आरोप था कि वे अपहरण और कथित फर्जी मुठभेड़ की टीम का हिस्सा थे। एक आरोपी उस फार्महाउस का मालिक भी था जहां सोहराबुद्दीन और कौसर बी को कथित तौर पर बंधक बनाकर रखा गया था।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक मामलों में सिर्फ आशंका या शक के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष अदालत के सामने ऐसा कोई पुख्ता सबूत पेश नहीं कर सका जिससे आरोपियों की संलिप्तता संदेह से परे साबित हो सके।
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