वंदे मातरम को राष्ट्रगान जैसा दर्जा: कैबिनेट की मंजूरी, अपमान पर सख्त सजा का प्रावधान

केंद्र सरकार ने एक बड़ा और अहम फैसला लिया है। राष्ट्रगीत वंदे मातरम को अब राष्ट्रगान जन गण मन के समान दर्जा दिया जाएगा। यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में लिया गया। इस फैसले के साथ ही राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम में संशोधन को भी मंजूरी दी गई है। सरकार का कहना है कि इस कदम से राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान और जागरूकता बढ़ेगी।
सरकार ने साफ किया है कि अब वंदे मातरम के साथ वही नियम लागू होंगे, जो राष्ट्रगान पर लागू हैं। यानी अगर कोई व्यक्ति इसके गायन में बाधा डालता है या अपमान करता है, तो उसे सजा मिल सकती है। कानून की धारा 3 में संशोधन किया जाएगा। इसके तहत तीन साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति दोबारा ऐसा अपराध करता है, तो कम से कम एक साल की सजा तय होगी। यह प्रावधान पहले केवल राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज पर लागू था।
कार्यक्रमों में होगा अनिवार्य पालन
गृह मंत्रालय ने वंदे मातरम के गायन को लेकर विस्तृत गाइडलाइन जारी की है। इसके अनुसार, छह श्लोकों वाला पूरा वर्जन प्रमुख सरकारी कार्यक्रमों में गाया जाएगा। इसकी अवधि करीब तीन मिनट 10 सेकंड होगी। राष्ट्रीय ध्वज फहराने, राष्ट्रपति और राज्यपाल के कार्यक्रमों और औपचारिक आयोजनों में इसका उपयोग किया जाएगा। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कार्यक्रम की गरिमा बनी रहे।
पहले राष्ट्रगीत, फिर राष्ट्रगान का नियम
नई गाइडलाइन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि अगर किसी कार्यक्रम में दोनों गीत बजाए जाते हैं, तो पहले वंदे मातरम और उसके बाद राष्ट्रगान गाया जाएगा। दोनों के दौरान सभी लोगों को सावधान मुद्रा में खड़े रहना होगा। इसे सम्मान का प्रतीक माना जाएगा। हालांकि सिनेमा हॉल और फिल्मों में इसके लिए छूट दी गई है। वहां दर्शकों को खड़े होना अनिवार्य नहीं होगा।
युवाओं में जागरूकता पर फोकस
सरकार ने स्कूलों, कॉलेजों और अन्य संस्थानों में वंदे मातरम के गायन को बढ़ावा देने की बात कही है। इसका उद्देश्य युवाओं में राष्ट्र के प्रति सम्मान और जुड़ाव बढ़ाना है। मंत्रालय का मानना है कि इससे नई पीढ़ी को देश के इतिहास और मूल्यों की बेहतर समझ मिलेगी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
वंदे मातरम का इतिहास काफी समृद्ध है। इसे बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 में लिखा था। बाद में यह उनके उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ। 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में गाया था। यह गीत स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक नारे के रूप में उभरा। इसका अर्थ है- हे मातृभूमि, मैं तुम्हें नमन करता हूं।
राजनीतिक और सांस्कृतिक महत्व
हाल के वर्षों में वंदे मातरम राजनीतिक और सांस्कृतिक चर्चा का केंद्र रहा है। खासकर पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान इसे राष्ट्रवाद और अस्मिता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। संसद में भी इस पर बहस हुई। सरकार का मानना है कि यह फैसला देश की एकता और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करेगा। वहीं विपक्ष ने इसे राजनीतिक नजरिए से भी देखा है।
गणतंत्र दिवस पर भी दिखी थी थीम
इस साल 77वें गणतंत्र दिवस परेड की थीम भी वंदे मातरम रखी गई थी। कर्तव्य पथ पर निकली झांकी को बेस्ट अवॉर्ड मिला था। इसमें भारत की सांस्कृतिक विविधता और इस गीत की ऐतिहासिक यात्रा को दर्शाया गया था।











